आ मैं तुझसे शरारत कर लूं

आ मैं तुझसे शरारत कर लूं

आ मैं तुझसे शरारत कर लूं


आ मैं तुझसे शरारत कर लूं , थोड़ी सी तुमसे मोहब्बत कर लूं ,

आ तेरी उलझी लट संवार दूं , तेरे बालों में गजरे का हार पहना दूं ।


तेरे लबों से चुरा कर के लाली , अपने लबों का प्यार दूं ,

आ तुझे छुपा लूं मैं आगोश में , कुछ करूं शरारत तुम संग ,

कुछ चुरा लूं शोख बदन की शोखियां तेरे , कुछ अपने तन - मन का भी तुमको उपहार दूं ।


ना देखना तुम ज़माने को , ना मैं नज़र उधर घुमाऊंगा ,

तुम डूब जाओ मेरी निगाहों में , मैं तुम्हारे नैनार्णव में डूब जाऊंगा ।

पीएंगे हाला के घूंट एक - दूजे के लबों की , समा कर हम तुम एक - दूजे में ,

शरारत के कुछ पल चुरा कर के , खो जाएं एक - दूजे में ।

आ महक तेरे बदन की लेकर मन अपना महकाऊं मैं ,

बन जाऊं मैं चांद तेरा , चांदनी तुझ पे लुटाएं मैं ।


मैं बन कर के परवाना तड़पता रहूं , तु बन शमां मुझे जलाती रहे ,

मुझ को समा लो तुम अपने अन्दर , तेरी अग्न में जल जाऊं मैं फ़ना हो जाऊं ।


कभी जुदा ना हो तुम मुझसे इस कदर तुझ पर मोहब्बत लुटाऊं मैं ,

आ फलक के सितारे भी तेरी मांग में सजाऊं मैं ।

आ मेरी महबूबा कर कुछ ऐसी शरारत कि सुध - बुध अपनी बिसराऊं मैं ।


आज हटा दो पर्दा लाज - शर्म का , तुझे प्यार की चुनरी औढ़ाऊं मैं ,

आ तेरे रूप की पूजा करूं मैं , बांहों के तुझे हार पहनाऊं,

जल उठे तन - बदन तुम्हारा ऐसी कोई शरारत कर जाएं ।

बनो तुम धरा प्यासी , काली घटा बन जाऊं मैं, उमड़ - घुमड़ कर आऊं,

तुझ पर नेह - मेह बरसाऊं मैं ।


मौलिक एवं स्वरचित

प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

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