आख़िर दोषी कौन

आख़िर दोषी कौन



भगवा पहन लेने से आप खुद को साधु के तौर पर प्रस्थापित नहीं कर सकते। शुद्ध आचार-विचार से लोक कल्याण के कार्य आपको एक संत का दरज्जा देता है। एक बार संसार को त्याग दिया दिया तो ताउम्र मोह माया का हल्का सा खयाल भी नहीं आना चाहिए।


कोई साधु कब बनता है? जब संसार से मोह माया उठ जाए, मन को और आत्मा को ईश्वर स्मरण और मोक्ष पाने की लगन लग जाए तब इंसान घर परिवार और संसार को छोड़ कर भगवा धारण करके किसी आश्रम या पर्वतों पर अपना डेरा लगा लेता है।

हमारे देश में संतों और धर्म गुरुओं की कमी नहीं है जिन्होंने स्वस्थ समाज के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है पर, वर्तमान में नकली और ढोंगी साधुओं एवं बाबाओं ने वातावरण को इतना प्रदूषित कर रखा है कि लोग सच्चे साधुओं व बाबाओं पर भी शंका करते है।

कहाँ है आज शंकराचार्य, वल्लभाचार्य रामानुजाचार्य और कबीरदास जैसी सोच वाले संत।


वास्तव में साधु वह है जो कुटिया या आश्रम के नाम पर न तो महल खड़ा करता है, और न ही धन या सम्पत्ति का संग्रह करता है। आज कल के साधुओं के मठ और आश्रम 5 स्टार होटलों से कम नहीं होते। लग्ज़री गाड़ियों में घूमते है, और आश्रमों में भी न जानें कौनसे अवैध गतिविधियाँ होती रहती है।


सच्चा साधु औरतों से दो गज की दूरी रखकर चलता है। पर आजकल के संतों की अनुयायी औरतें ही होती है, ऐसे में कहाँ से मोह माया छूटेगी। सच्चा साधु दो बातों से हमेशा दूर रहता है नमस्कार और चमत्कार। जो साधु सच में आध्यात्म की चरम छू लेते है उनको चमत्कार दिखाने की जरूरत ही नहीं होती। और न ही सच्चा साधु किसीका नमस्कार स्वीकार करता है। औरतों की इज्जत में वह खुद नतमस्तक होता है। पर जिनको औरतें और समाज को मूर्ख बनाकर फ़ायदा ही उठाना है वह चमत्कार का सहारा लेकर फांसने की दुकान लगाकर बैठ जाते है। और ज़्यादातर औरतें चमत्कार के नाम पर आकर्षित होते ऐसे बाबाओं की झूठी ओरा में बहकर उनके शरण में जा गिरती है, जहाँ उनके चरित्र का पतन निश्चित होता है।


क्यूँ औरतें ऐसे साधु के भेष में छुपे शैतान को पहचान नहीं पाती? दरिंदे की एक हल्की नज़र उनके इरादे बयाँ कर देती है। कोई औरत इतनी भी भोली नहीं होती की सामने वाले के इरादों को पहचान न पाए, आतुरता दोनों तरफ़ होती है तभी किसी ऐसी परिस्थिति का निर्माण होता है। आख़िर कौन सी लालच औरतों को अपने चरित्र से गिराने पर मजबूर करती है? अकेला वह साधु दोषी नहीं, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती किसी दो लोगों द्वारा किए गए गलत कार्य का दोष किसी एक पर थोपना सही नहीं। जब खुद खरबूजा ही चाकू पर गिरने के लिए बेताब हो तब खरबूजा ही कुसूरवार कहलाएगा, चाकू की तो फ़ितरत ही काटने वाली होती है। औरतों को भी अपना दायरा मालूम होना चाहिए। सारे विकारों से उपर उठ चुका साधु अपना आचरण छोड़ कर व्यभिचारी बनकर स्त्री को फुसलाता है तब वो तो बेशक दोषी होता ही है। पर एक घरेलू महिला भी धर्मांधता में बहकर और लालच की शिकार बनते पतन की राह चुन लेती है तब वासना का चोला वह भी तो पहनती है।


साधु महज़ इंसान ही तो है कोई भोले शंकर तो नहीं, की औरत की मोहिनी से परे रह सकें, और इंसान की नीयत बदलते देर नहीं लगती तो साधु से ज़्यादा वह औरत दोषी हुई जो अपनी दहलीज़ का दायरा लाँघकर ऐसे ढोंगियों की जाल में फंस कर खुद पतिता बन जाती है। और कामुक महिलाएं ऐसे साधुओं को अवसर देती है दोनों के पतन का। कोई भी काले माथे वाला इंसान कितना भी महान क्यूँ न बन जाए, किसीके जीवन में आने वाली मुसीबतों को न रोक सकता है न मिटा सकता है। औरतों को ये बात समझनी चाहिए, अपनी तकलीफ़ों का पिटारा लेकर किसी साधु संत के पास मत जाओ उनको अपना काम करने दो। ईश्वर से बड़ा कोई नहीं उनके शरण में जाकर हर मुश्किलों का समाधान मिल जाएगा। स्त्री चिंगारी है और पुरुष हवा आग उठनी लाज़मी है। चिंगारी को अपनी खिडकीयां बंद रखनी चाहिए हवा तो बहने के लिए दरारों से भी अपनी जगह बना लेती है।


भावना ठाकर \"भावु\"

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