आरक्षण आख़िर कब तक


"आरक्षण क्यूँ, और कब तक"

आरक्षण का मतलब किसी काबिल व्यक्ति का हक मारना, अपने बलबुते पर नहीं बल्कि जात-पात का सहारा लेकर जिस कुर्सी के हकदार नहीं उस पर बैठ जाना। आज आरक्षण की वजह से होनहार लड़के 95/96 % के साथ भी नौकरी के लिए भटक रहे है और 40/60 % वाले उनका हक छीन कर ले जाते है। जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए आरक्षण को, दम है तो आगे बढ़ो। दुनिया में काम की कमी नहीं।


आरक्षण सिर्फ़ शारिरीक तौर पर अपाहिज या अति पिछड़े वर्ग के लिए होना चाहिए, वो भी काबिलियत पर। आरक्षण के नाम पर बनें डाॅक्टर, इन्जीनियर या नेता देश और समाज का क्या भला करेंगे। आज स्थिति यह है कि यदि आप केवल इतना ही पूछ लें कि आरक्षण कब खत्म होगा, तो तुरंत आपको दलित-विरोधी की उपाधि से नवाज़ दिया जाएगा। कोई ये नहीं सोचता कि आरक्षण एक ऐसा दीमक है जो देश की होनहार शख़्सीयतों को खा रहा है। क्या केवल कुछ उपजातियां ही अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पदों पर कब्जा जमा रही हैं? क्या जातियों को पिछडे वर्ग की सूची में इसलिए शामिल किया जा रहा है कि वे सचमुच पिछड़ी और वंचित हैं? या इसलिए कि उनकी शक्ति और प्रभावशीलता को देखते हुए राजनेताओं को ऐसा करना पड़ रहा है?


अस्पृश्यता की नीति के कारण बहुत कुछ सहा था, आदरणीय भीमराव अंबेडकर जी ने आरक्षण नीति की परिकल्पना की और लागू किया जिसका मूल उद्देश्य अछूत समझी जानेवाली अनुसूचित जाति और आदिम अधिवासी, वनवासी अर्थात् अनुसूचित जनजाति के लोगों को कुछ विशेष सुविधाएँ तथा रियायत देकर सामान्य लोगों के बराबर लाना था। लेकिन इस नीति का मूल मुद्दा उद्देश्य से भटक गया है।

कुछ अत्यन्त धनवान हैं, कुछ करोड़पति अरबपति हैं, फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, ऐसे सम्पन्न लोगों के लिए आरक्षण सुविधाएँ कहाँ तक उचित है? कब तक चलेगा ऐसा? जाति प्रथा केवल हिन्दू धर्म में ही हैं। फिर भी कुछ हिन्दू जो मुस्लिम या ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं, अर्थात् सामान्य वर्ग में आ चुके हैं, फिर भी वे आरक्षण नीति के अन्तर्गत अनुचित रूप से विभिन्न सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। उन्हें रोकने के लिए क्या कानूनी कार्यवाही हो रही है


आज देश मे एक व्यक्ति एक संविधान क्यों नही लागू होता? आरक्षण से दलित वर्ग को आज तक कितना लाभ हुआ?हम हर जगह खुली प्रतियोगिता की बात करते है, तो फिर सभी नागरिको को समान प्रतियोगिता का अवसर क्यों नही देते? कब तक हम वर्ग विशेष को आरक्षण के नाम पर नौकरियां थाली में रखकर परोसते रहेंगे? सामजिक न्याय के नाम पर हम कब तक योग्य प्रतिभा का गला घोंटते रहेंगे।

आज आरक्षण को ऐसी जरूरत बना दिया गया कि 70 वर्ष बाद भी इसका कोई अंत नहीं है। आरक्षण किसी पिछड़े व्यक्ति के अधिकार से ज्यादा राजनीति खेलने का हथियार बन चुका है।


उच्च वर्ण का गुनाह क्या है? क्यूँ काबिल होने के बावजूद इनके बच्चों को सही स्थान नहीं मिलता सोचनीय मुद्दा है।

आज जब भारत तरक्की की राह पर आगे बढ रहा है तो उसे फिर से पीछे धकेलने की साजिश है ये। समाज को दो हिस्सों मे बाँटने की साजिश है। आजादी के सात दशक बाद भी यदि हम आरक्षण की राजनीति करते रहे तो लानत है हम पर। निश्चित रूप से जब डॉ अम्बेडकर ने ही यह कहा आरक्षण वैसाखी नही है तो फिर आज इतने साल के अन्तराल पर समीक्षा होने के बजाय पुन: आरक्षण को बढ़ावा देना कितना उचित है।

राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते हैं की आरक्षण की व्यवस्था ख़त्म हो क्योंकि यही उनका सबसे बड़ा वोट बैंक है, जिसमें उच्च वर्ण के होनहार बच्चें बलि चढ़ रहे है।


(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु

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