आस लिए खड़ी हूँ

आस लिए खड़ी हूँ


\"आस लिए खड़ी हूँ\"
नहीं जान पाई मैं मोहब्बत की रिवायते
जब तुम मेरे करीब थे तुम्हारी आगोश की गर्मी मेरे तन को तराशते अपनी पनाह में लेते सहलाती थी, काश वो लम्हा मैं जी पाती..

अब आस लिए खड़ी हूँ की तुम मुझे पुकार लो, मौन तम के पार से हल्की सी आवाज़ तो दो, ज़िंदा हूँ अभी उर की वीणा बज रही है..

नैंनो की छटपटाहट को अश्कों का उपहार देकर फासलों में सिमटे है दोनों,
मेरे मन की अटारी पर तन्हाई सज रही है, काश खुशियों के लम्हें मैं जी पाती..

एक तुम्हारे वजूद से लिपटी कोई ओर रुप जानूँ ना, टटोलकर देखा रिश्ते का कंबल विनष्ट स्वप्न की तान बज रही है..

विषाद से भरी गगरी जीवन की खुशीयों की कोई जगह ही नहीं, निदाध से उम्मीद करके तन विभावरी नित जल रही है..

पथ पर नैंन बिछा लिए मैंने लौट आओ की अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, उम्मीद की चंद लड़ी में रोशनी झिलमिला रही है..

क्यूँ मेरे मनुहार पर तुम तिल भर ना हिल रहे, जिस लगन में मैं जलूँ तू उस लगन से क्यूँ है परे, इंतज़ार में बरबस मेरी आस मर रही, काश नज़दीकीयों के वो लम्हें मैं जी पाती।
भावना ठाकर \"भावु\" (बेंगलूरु, कर्नाटक)
#जनवरीकविताएं

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