अब फर्क ही नहीं पड़ता!

अब फर्क ही नहीं पड़ता!

जब से रिश्ते की बात चली मैं कुछ शरमाई सकुचाई सी रहने लगी थी। हमारे घर में लड़कियों के लिए शादी विवाह के फैसले घर के बड़े बुजुर्ग ही लेते थे। मैं भी इन्हीं संस्कारों से बँधी हुई थी। वैसे भी अपने घरवालों पर पूरा विश्वास था मुझे कि वो जो भी निर्णय लेंगे वह मेरे हित में ही होगा।


संयुक्त परिवार था उनका।


अजय अर्थात लड़के के परिवार में कुल ग्यारह सदस्य थे। माता पिता दो बड़े भाई भाभियाँ व एक भाई के दो व एक का एक बेटा तथा अजय से छोटी एक बहन। परिवार में मेरे सम्मिलित हो जाने के बाद ये संख्या पूरे दर्जन भर हो जाने वाली थी। दूसरी ओर मेरा परिवार संयुक्त होते हुए भी एकल परिवार ही कहा जा सकता था क्योंकि दादी ने तीनों बेटों की गृहस्थी बहुत प्यार से अलग अलग कर दी थी। बड़े से एक ही घर में रहते हुए भी परिवार में तीन रसोई थीं। दादी दादा एक बेटे की रसोई में नाश्ता करते, एक के साथ सुबह का व दूसरे के साथ शाम का भोजन करते।त्योहार सभी हमेशा मिलजुल कर मनाते। इसके पीछे उनकी सोच यही थी कि कभी काम को लेकर बहुओं में वैमनस्यता न होने पाए। परिवार में भाईचारा रहे।


अजय के परिवार में ऐसा कुछ भी नहीं था। साझा चूल्हा था वहाँ। मैं तो इस बात को लेकर उत्साहित ही थी कि आज के जमाने में सभी इतना मिलजुल कर रहते हैं और भोजन भी साथ साथ करते हैं। पर मेरी मम्मी को इस बात से थोड़ा संकोच हो रहा था। एक और बात जो मम्मी को अखर रही थी वह ये कि अजय की मम्मी को आँखों से न के बराबर दिखाई देता था। बहुत साल पहले ही वह आँखों की रोशनी खो चुकी थीं। उन्हें आकृति तो थोड़ी बहुत दिखाई देती परंतु चेहरा स्पष्ट नहीं होता। इस वजह से एक तरह से बिस्तर पर ही थीं वह।


वैसे ये अखरने वाली बात नहीं थी। शारीरिक कष्ट तो कभी भी किसी के साथ हो सकता है, पर माँ का दिल था और उन्हें फिक्र थी कि उनकी लाड़ली बेटी कहीं इतने बड़े परिवार और दूसरों पर पूरी तरह आश्रित अपनी सास की सेवा करते हुए पिस कर न रह जाए।

उन्होंने जब ये बात उठाई तो सभी ने इस आशंका को निर्मूल और बेटी के अतिमोह से प्रेरित बताया। फिर भी मुझसे मेरी राय पूछी गई पर मैंने भी विवाह के लिए सहमति देदी। एक तो अजय मुझे पसन्द थे दूसरे सास ससुर की सेवा करने की भावना कहीं भीतर हिलोरें ले रही थी।


विवाह हुआ और मैं ससुराल आ गई। आते ही जो पहला आघात मेरे कोमल हृदय पर पड़ा वह दहेज के तानों के साथ साथ मेरे रूपरंग पर भी प्रहार था।


बड़ी जेठानी सासु जी को संबोधित करती हुई बोली


"माँजी आप तो कहती थीं कि रंगरूप नहीं भी है तो कोई बात नहीं, बड़ा परिवार है, शशी दहेज अच्छा लाएगी। पर पता है आपको एक चीज ढंग की नहीं आई इसके यहाँ से"


"और हमारे लिए सोने की एक अंगूठी तक नहीं। मेरी शादी में जेठानी जी को शिकायत थी कि उनके लिए सोने का हार नहीं आया, चलो नहीं आया था पर कानों की बालियाँ तो थीं। इसके यहाँ से तो साड़ी भी ढंग की नहीं मिली।"


छोटी देवरानी मुँह बिचका कर बोली।


"और मेरे लिए क्या आया?"


ये मेरी सास की आवाज़ थी जिसे मैं घूंघट में होने के बाद भी पहचान गई थी।


"ये लो अम्मां ये कानों की बालियाँ हैं तुम्हारी और मेरी। फूल से भी हल्की हैं।"


मेरी ननद बेबी ने मुँह बनाते हुए अम्मां के हाथ में बालियाँ पकड़ा दीं। सासू जी ने दोनों हाथों से बालियों को टटोला जैसे वजन का अंदाजा लगा रही हों और फिर क्रोध से बोलीं


"यही इज्जत देना जानते हैं इसके घरवाले? मेरी तरफ से जो मुँहदिखाई में देने के लिए हार बनवाया था वह बेबी की शादी के लिए रख दो, शशी को यही बालियाँ दूँगी मैं।"


उनकी आज्ञा का पालन हुआ और मेरे मायके से सास के लिए आई बालियाँ मुझे ही पकड़ा दी गईं। मुझे हार न मिलने पर कोई अफसोस नहीं था पर मायके का अपमान मुझसे सहन नहीं हो रहा था। किसी तरह स्वयं पर काबू रखे मैं बैठी रही। हर रिश्तेदार मौसी, ताई, बुआ घूंघट उठाते हुए मेरे रूपरंग पर कटाक्ष करती रहीं और मेरी सास अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाती रहीं।

सास की सेवा करूँगी ऐसी जो प्रबल भावना मन में लेकर आई थी वह पहले दिन ही कहीं विलुप्त हो गई थी।


फिर तो ये सिलसिला चल निकला। दहेज कम लाने का ताना उठते बैठते मुझे दिया जाने लगा। इतना भी मैं सहन कर ही रही थी पर रंगरूप तो ईश्वर की देन है जब उस पर भी कटाक्ष किए जाते तो मेरी आँखों में आँसू आ जाते। पर उन आसुँओं की कीमत वहाँ किसी के लिए नहीं थी। मेरे पति अजय तो घरवालों के विरुद्ध एक शब्द कहना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते थे।


घर के हर छोटे बड़े काम की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई थी। दहेज जो कम लाई थी।

जेठानियाँ खुद तो ताने कम देतीं पर सास ननद को भड़काने में कोई कसर नहीं रख छोड़तीं।


एक रोज सब्जी काटते समय मेरे हाथ के अंगूठे पर गहरा कट लग गया। आँसू पोंछने को कोई मौजूद नहीं था। किसी तरह खाना बनाया। शाम को जेठानियों को हाथ दिखाते हुए सब्जी काटने का आग्रह किया तो बड़ी ने जवाब दिया


"मैंने आज ही नेलपेंट बदला है, खराब हो जाएगा। मैं तो नहीं काट सकती।"


छोटी भी कुछ कम न थी, सीधे सास से ही बोली


"माँजी आजकल शशी को भी अपने हाथों की खूबसूरती की चिंता होने लगी है। जरा सा हाथ कट गया और बहाने इत्ते बड़े बड़े।"


फिर तो माँजी शुरू ही हो गईं


"ये नाज नखरे यहाँ कोई नहीं उठाएगा। सब्जी न काटने से सुंदरता नहीं बढ़ जाएगी तुम्हारे हाथों की। जैसी कुरूप हो वैसी ही रहोगी।काम न करने के सौ बहाने तैयार रहते हैं तुम्हारे पास हर समय।"


आज मुझसे रहा नहीं गया तो मैं चिल्ला कर बोली


"जब आपको मेरा रंगरूप दिखाई तक नहीं देता तो क्यों मुझे कुरूपता के ताने देती रहती हैं? सुना था जिन्हें दिखाई नहीं देता वह लोग मन की आँखों से देखते हैं। पर आपके पास तो मन नाम की चीज़ है ही नहीं तो आपको ये सौभाग्य भी नसीब नहीं कि मन की आँखों से देख सको। अगर होता तो मेरे मन को रात दिन यूँ घायल होते शायद देख पाती आप"


एक पल को वहाँ चुप्पी छा गई। मुझे लगा कि शायद अब ये लोग सुधर जाएँगे, पर मैं गलत थी। उस दिन दफ्तर से आने के बाद अजय ने पहली बार मुझपर हाथ उठाया।

जी चाहता था सब कुछ छोड़छाड़ कर मायके चली जाऊँ, पर दादी की सीख याद आई, \"बेटियाँ डोली में विदा होती हैं पर अर्थी में ही ससुराल से निकलती हैं।\"


मेरा कोमल हृदय आघातों को सह सह कर कठोर होता चला गया। समय के साथ साथ दोनों जेठानियाँ संयुक्त परिवार से अलग हो गईं, बेबी ससुराल चली गई व ससुर जी भगवान को प्यारे हो गए।


बीस बरस गुजर गए इन बातों को, जेठ जेठानियाँ हमसे तो क्या, सास से मिलने भी नहीं आते कभी। मैं सास का सभी काम अब भी समय पर करवाती हूँ पर उसके लिए एक सहायिका नियुक्त की है मैंने। कोई भावनात्मक जुड़ाव बाकी नहीं। स्वयं उनसे पूरी तरह दूर हूँ। वह सेवा भावना अब उनके लिए तो क्या अजय के लिए भी नहीं उमड़ती।


इसके लिए अजय अब भी मुझे दोषी समझते हैं पर अब मुझे किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरा मन जानता है कि मैं निर्दोष हूँ। यों तो मैं आज भी किसी का अहित नहीं चाहती लेकिन अब मुझमें धैर्य समाप्त हो चुका है इसीलिए अब मुझसे कुछ भी कहने पर अजय को भी उल्टे सीधे जवाब सुनने पड़ते हैं। शायद कोई इस बात को मानने के लिए तैयार न हो कि जो परिस्थितियाँ आज बन चुकी हैं उनके लिए मेरा परिवार ही जिम्मेदार था, मैं नहीं। हो सकता है मेरे बच्चे भी मुझे ऐसा व्यवहार करते देख कर यही सीखें। बड़ों की सेवा करना, हृदय से उनका आदर करना वह शायद कभी नहीं सीखेंगे पर मैं क्या करूँ अपने इस दिल का, जो इतने वार सह कर इतना कठोर हो चुका है कि अब न तो अपनी सास के आँसू और न ही उनकी शिकायतों से पिघल पाता है। इस पत्थर हो चुके दिल पर अब कोई फर्क ही नहीं पड़ता ।

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