अभी-अभी

अभी-अभी


"अभी-अभी"
जश्न बन गई बेरंगी सी ज़िस्त मेरी किया जो इज़हार-ए-इश्क तुमने मुस्कुराते महबूब अभी-अभी..

सिहरन सी दौड़ गई सनम मेरे तन के पिंजर में आँखों से छुआ जो तुमने कुछ यूँ अभी-अभी..

अंग-अंग से बिखरी है संदली सी खुशबू यूँ लबों की नर्मी से चूमा जो तुमने मेरे लबों को अभी-अभी..

पहचान ली है मेरे दिल ने तुम्हारी मौन की भाषा बिना बोले जो कह दी तुमने एक बात अभी-अभी..

गुदगुदा गई मेरे अहसासों को तुम्हारी धड़कन लिया जो मेरा नाम धक-धक की तान पर अभी-अभी..

हया के मारे सिमट गई मेरी काया कुँवारी कमनीय, कातिल नज़रों से तुमने कुछ यूँ छुआ जानम अभी-अभी..

कहती है तुमसे कुछ मेरी निगाहों की शौख़ी पढ़ लो न पलकें उठी है पल भर के लिए अभी-अभी..

ईशश मार ही डालोगे अपनी अदाओं के वार से ऐसे न इश्क जताओ वल्लाह जैसे जताया अभी-अभी..

तुम्हारी इस हरकत पर वारी जाऊँ अपना सबकुछ साजन, तुमने जो सिंदूर से मेरी मांग भरी है अभी-अभी..
भावना ठाकर \"भावु\" बेंगलोर

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