अदा या पटकथा?

अदा या पटकथा?

एक सफल फिल्म के पीछे कई लोगो का काम होता हैं लेकिन आम जनता के लिए स्क्रीन पर नजर आने वाले अभिनेता और अभिनेत्री ही सब कुछ हैं | इसी सोच की वजह से बॉलीवुड ने बहुत लम्बे समय तक अच्छी कहानियों के ऊपर बड़े चेहरे को तरजीह दी| दर्शक अपने चहेते सितारे को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी , पट्कथा या संवाद, निर्देशन जैसी चीजों से कुछ लेने देना नहीं होता था|

आज भी ज्यादा कुछ नहीं बदला है, ईद का मौका और डोले दिखाता अभिनेता काफी है १००-२०० करोड़ कमाने के लिए | उडती हुई गाड़ियाँ, खूबसूरत हीरोइन, तंग वर्दी पहना एक गुस्से मे सब धुल करता एक्शन स्टार और पुराने गाने को श्रदांजलि देता नया रीमिक्स पार्टी वाला गाना| बस आपकी चाट तैयार हैं, पेश कीजिये और दर्शक ख़ुशी-ख़ुशी आपको पैसा देने को तैयार हैं| सिनेमा के इस आयाम का भी अपना तर्क हैं, आख़िरकार फिल्म्स एक आर्थिक व्यापार ही तो हैं, जहाँ एक सामान्य व्यापार की तरह मुनाफा कमाना लक्ष्य हैं| चाहे दशक हो ८० का या २००० का , हर दौर मैं ये बात बिलकुल सही रही है| सिनेमा के बांटे हुए हिस्से जैसे कला फिल्म , मसाला फिल्म या कमर्शियल फिल्म, इस तरह की फिल्मों ने हमेशा राज किया | पटकथा कभी भी सितारों के ऊपर नहीं जा सकी |

पिछले एक दशक से बयार उलटी बह रही है, अच्छी कहानी/ पटकथा वाली फिल्मों की उपस्थिति इतनी मजबूत कभी न थी| दर्शक अच्छी कहानी वाली फिल्मों पर पैसा खर्च करने को तैयार और बड़े सितारे की बिना सर पैर कहानी वाली फिल्मो में उनकी रूचि नहीं हैं| तमाशा, ट्यूबलाइट, फैन, जीरो, ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान जैसी फिल्मों की असफलता और अंधाधुन्द, बरेली की बर्फी, सोनू के टीटू की स्वीटी की सफलता दर्शक की इस बदलते मूड को साफ साफ़ दर्शाती हैं| बड़े सितारों की फ़ौज भी अच्छी कहानी की कमी को पूरा नहीं कर सकती। हाल ही में प्रदर्शित कलंक इसका सबसे बेहतर उदहारण हैं| दर्शक अच्छी कहानी के साथ सहमत (मेघना गुलज़ार निर्देशित राज़ी) को स्वीकारने को तैयार हैं लेकिन बेअसर कहानी के साथ उन्हें रूप पसंद नहीं हैं (अभिषेक वर्मन निर्देशित कलंक), जबकि दोनों किरदार निभाने वाली अदाकारा एक है|

मसाला सिनेमा बहुत जरुरी है, फिल्म इंडस्ट्री का आर्थिक पहिया घुमाने के लिए , लेकिन केवल अच्छी कहानियों पर जोर ही हमारे सिनेमा को आगे ले कर जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय मंच और दूसरे देशों मैं हमारे सितारों की पहचान ना भर हैं, लेकिन एक अच्छी कहानी हर जगह अपील करती हैं| अन्धाधुन जैसी डार्क कॉमेडी फिल्म का चाइना जैसे मुल्क में शानदार कारोबार , अपने आप में एक मिसाल है| दर्शकों को इस बदलते रुख को समझ कर आगे बढ़ने में ही बॉलीवुड का भविष्य छुपा है|

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