ऐसी बेटियां किस काम की ?

ऐसी बेटियां किस काम की ?

शारदा जी आजकल थोड़ा व्यस्त हैं, एक तरफ बेटी मायके आई हुई है तो दूसरी तरफ उनके नाती को जलने से बचाने के चक्कर में बहू राधिका का हाथ जल गया है। बेटी की आवभगत तो कर ही रही है, साथ साथ बहू की भी मदद कर रही है। शुरुआत के कुछ दिन तो बेटी सीमा ने भी एहसान मानते हुए राधिका की मदद की। लेकिन राधिका के हाथ पर जो छाले पड़ चुके हैं उन्हें ठीक होने में समय लगता देख सीमा उकता गई है और काम से भागना चाहती है। शारदा जी के काफी समझाने के बाद भी सीमा को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि जिस राधिका भाभी ने उसके बेटे की जान बचाई है कुछ दिन सीमा को उसी राधिका भाभी की घर के कामों में मदद करवाना उसका फर्ज भी है और कर्तव्य भी। आज सुबह भी शारदा जी ने सीमा को यही सब कुछ समझाया लेकिन वही ढाक के तीन पात।

थोड़ी देर बाद ही सीमा शारदा जी के कमरे में आई और बोली "मां, मैंने आकाश को फोन कर दिया है और कल वह मुझे लेने आ जाएंगे।"

"बेटा अचानक से क्या हो गया और जाने को तैयार भी हो गई?"

"बस मां मन भर गया है मेरा, इसलिए आकाश को फोन करके बोल दिया है।"

"पर बेटा इस कोरोना काल में दिक्कत होगी तुझे जाने में, फिर कब आ पाएगी?"

"तो क्या हुआ मां....... आई भी तो इस कोरोनाकाल में थी ना......  मायके में आने का मन था.......आ गई....... अब जी भर गया...... तो जा रही हूं और वैसे भी मैं यहां पर आराम करने आई थी..........इस लोक डाउन के चक्कर में बहुत परेशान हो गई थी मैं पूरा दिन घर में काम करते करते थक गई थी तो सोचा मायके में जाकर कुछ दिन आराम कर लुंगी......  लेकिन यहां भी चैन कहां है मुझे।"

"सीमा ये कैसी बातें कर रही है बेटा....... जब भी तू मायके में आती है हमेशा तू आराम ही तो करती है इस बार अगर तूने थोड़ा सा काम कर लिया तो कौन सी आफत आन पड़ी है।"

"थोड़ा सा काम....... वाह मां..... तुम भी अपनी बहू की ही साइड लेना।  बेटी तो जैसे तुम्हारे लिए है ही नहीं।  हाथ जला कर बैठ गई है तुम्हारी लाडली बहू ताकि कोई काम ना करना पड़े और सारा का सारा काम मेरे ऊपर डाल दिया है....... मैं तो जा रही हूं।"

"बेटा तू जानती है कि उसकी हाथ क्यों जले हैं.......अगर उसके हाथ ना जले होते ना तो इस समय तेरे बेटा झुलस चुका होता समझी .......... उसका एहसान मानना तो दूर की बात है तू तो अपनी भाभी की बेइज्जती कर रही है।"

"हा तो उसकी जगह कोई और भी होता.......  तो भी मेरे बेटे को बचा ही लेता।  माना कि हाथ जल गए हैं लेकिन थोड़ा बहुत काम तो कर ही सकती है ना....... पर नहीं।"

"वाह बेटा वाह......  अपने हाथ जला कर उसने तेरे बेटे की जान बचाई है और तू कुछ दिन के लिए उसका घर भी नहीं संभाल सकती।  उसका घर तेरा मायका है। बेटा शायद तू भूल गई है और मुसीबत में बहन बेटियां ही काम आती है लेकिन तू तो खुद से मुसीबत में डाल कर काम ना करना पड़े इसलिए भाग रही है। थोड़ी तो शर्म कर ले सीमा.........क्यों मेरी कोख को लजा रही है........  और रही बात मेरी बहू की तो उसके जले हुए हाथ गवाह है कि उसने अपना फर्ज निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है उसने अपना फर्ज पूरी तरीके से निभाया है लेकिन तू...... तू तो अपनी बेटे के जान बचाने वाली अपनी भाभी का मान भी नहीं रख पा रही है।" गाल पर लुढ़कते हुए दो आंसुओं को पोछते हुए शारदा जी 2 मिनट के लिए मौन हो गई। शायद उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें लेकिन इतना होने पर भी सीमा वापस जाने के लिए तत्पर गुस्से में मुंह फुलाए हुए खड़ी थी।

"तू जाना चाहती है ना....... जा...... मैं अभी जिंदा हूं जैसे तैसे मैं संभाल लूंगी सब कुछ........  लेकिन अपनी बहू को एक भी काम नहीं करने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए....... छाले पड़ गए हैं उसके हाथों में............ ऐसे में कौन सा काम कर पाएगी वह जो तू कह रही है कि भाभी काम नहीं करती।"

"वाह मां तुम तो मुझे ही समझाने लगी........  यह भी नहीं सोचा कि मैं तुम्हारी बेटी हूं और अपने मायके आई हूं आराम करने।"

"सीमा आराम तो तू हमेशा करती है......  हर बार तेरी भाभी तेरे नखरे उठाती है........ लेकिन आज जब काम करने की बारी आई तो तू पीठ दिखा कर भाग रही है........ खैर तू तो शुरु से ही ऐसी है मतलबी..........मैं ही फालतू तुझसे उम्मीद लगा बैठी थी........... जब मेरे ऑपरेशन के समय पर तू हॉस्पिटल में रुकती थी तब कौन सा तू मेरी सेवा करती थी मोबाइल हाथ में लिए बैठी रहती थी।  जब तू अपनी सगी मां की सगी नहीं हुई तो भाभी की क्या होगी।  तेरी जैसी बेटियां किसी काम के नहीं होती। जा चली जा...अपने ससुराल और हां ये ले ₹5000 मायके में रहने आई है ना....... शगुन लेकर जाना।  कल की जाती,  आज जा।" 

इतना कहकर  शारदा जी ने अपना मुंह फेर लिया। और कुछ देर बाद एक लंबी सांस भर कर चल दी अपनी बेटी समान बहू के पास।

दोस्तों यह एक काल्पनिक कहानी है लेकिन कई बार ऐसा देखा गया है कि बेटियां मायके में आने पर केवल आराम ही करना चाहती है और मुसीबत पड़ने पर भी काम में हाथ नहीं डालना चाहती हैं मेरे विचार में यह सही नहीं है इस बारे में आपके क्या विचार है आपको मेरी यह कहानी कैसी लगी। अपने विचार साझा कीजिएगा।

धन्यवाद

रुचिका  खत्री

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