अनकहे एहसासों को उकेर रही हूँ

अनकहे एहसासों को उकेर रही हूँ

अनकहे एहसासों को उकेर रही हूँ मन की उलझन और दिल में विचारों का बवंडर तबियत के लिए ठीक नहीं।

दुन्यवी गतिविधियों में कुछ अनमनी सी विपदाओं का कहर ठीक नहीं।
अचानक किसी मौसम का बदलना ठीक नहीं..

अबला के मौन में छिपी दबी दबी सी आह की आहट ठीक नहीं, मर्द की आँखों से आंसू बनकर टूटते सपनों के मलबों का ढ़हना ठीक नहीं।

गहरे समुन्दर की सतह के भीतर पाताल में तूफ़ानो की साजिश ठीक नहीं,
किसी राह तकती बरसती नम आँखों का  सूखे में बदल जाना ठीक नहीं.. 

किसी बेटी का जवान होते किसीकी आँखों में खटकना ठीक नहीं,
किसी घर से एक माँ के जाते हुए कदमों  का वृध्धाश्रम की चौखट पर दम तोड़ना ठीक नहीं। 

रात के अंतिम पहर में दु:स्वप्न का आकर पलकों की दहलीज़ पर ठहर जाना ठीक नहीं,
नीर भरे काले बादलों का खलिहानों पर से बिना बरसे लौट जाना ठीक नहीं..

ठीक नहीं किसी परिवार के जलते दीपक का बुझ जाना,
या ठीक नहीं, इबादत का ईश की अर्श से टकराकर टूट जाना ठीक नहीं। 

किसी सुहागन के सर से सरताज के साये का उठ जाना ठीक नहीं,
ठीक नहीं कलियुग का दूसरा चरण धरती पर धरना हरगिज़ ठीक नहीं। 
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु।

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