अंतर्मन

अंतर्मन

"कहाँ जा रहे हो बेटा ?""कुछ नहीं माँ! बस आ रहा थोड़ी देर में ।""जल्दी आना।" पंकज  ने माँ से कह तो दिया पर वह खुद  नहीं जान पा रहा था कि उसे कहाँ जाना है ?उसका दिमाग सवालों के जाल में ऐसा फँसा था कि उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।शायद बाहर जाकर उसे कुछ हल मिले। कल ही डॉक्टर ने कहा था कि मीरा की गर्भ में  फिर से लड़की है ।दिल की बात ना सुनते ही उसने दिमाग को आगे कर दिया था ।

पर आज.... आज तो वह दिल और दिमाग के बीच में फँस कर रह गया है। जाँच करवा कर उसने एक गुनाह कर दिया जिसके लिए उसका अंतर्मन अभी तक उसे धिक्कार  रहा था पर आज अगर उसने माँ का दिल रखने के लिए मीरा का गर्भपात करवा दिया तो वह क्या मुँह दिखाएगा अपने आप को? किसी को नहीं पता चलेगा पर उसका अंतर्मन हमेशा इस गुनाह का साक्षी रहेगा। जो उसे उम्र भर कोसता रहेगा ।
नहीं! सिर्फ माँ की मुराद पूरी करने के लिए वह इतना बड़ा गलत फैसला  नहीं ले सकता ।उसकी चाल धीमी हो चुकी थी। वह अस्पताल जाने की बजाय घर की तरफ चल दिया। मीरा को खुशखबरी देने और माँ को समझाने।
"मीरा !मीरा कहाँ हो ?"

"अरे !बेटा अभी इतनी जल्दी गए अब वापस भी आ गए ।और बहू को क्यों आवाज दे रहा?कुछ हुआ क्या ।""हाँ!आप भी यही रहिए।" मीरा तब तक आ चुकी थी। मीरा को देख पंकज खुद को रोक न पाया। उसने मीरा के हाथों में अपने हाथों में ले लिया ।क्या बात है ?मीरा ने कभी पंकज को ऐसे नहीं देखा था ,वह भी माँ के सामने। वह डर सी गई ।"कहीं पंकज ने वही फैसला तो नहीं लिया ....।नहीं !नहीं !ऐसा नहीं हो सकता ।जल्दी बोलिए पंकज।" मीरा मन ही मन सोच रही थी जो उसकी आँखों ने कह दिया।

" मीरा !हम अपनी दूसरी बेटी का स्वागत बहुत धूमधाम से करेंगे ।कोई दिक्कत नहीं होगी। तुम चिंता मत करो ।"मीरा की आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े ।उषा जी कोने में खड़ी सारी बातें सुन रही थी।"पंकज!  इतनी बड़ी बात हो गई और तुम लोगों ने मुझे बताया नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं होगा।"

" नहीं माँ !आपने पूछा था ना !कि मैं इतनी जल्दी जल्दी कहाँ जा रहा था ?अस्पताल ही जा रहा था। गर्भपात के लिए डॉक्टर से मिलने। पर मेरे मन ने मुझे आगे नहीं बढ़ने दिया। दूसरों को धोखा देकर हम खुश रह सकते हैं पर खुद को धोखा देकर हम कभी खुश नहीं रह सकते।  क्या आप चाहती हैं  कि आपका बेटा कभी खुश ना रहे ?भगवान जो चाहता है वही होता है माँ।आप ने  एक बेटी चाही  पर नहीं मिली और अब लड़का चाह रही हो। हमारे चाहने से कुछ नहीं होता माँ। वह जानता है हमें क्या चाहिए ।"उषा जी कुछ बोल ना पाई। वह पंकज की बातों का मर्म  समझ चुकी थी ।उनके अंतर्मन ने भी तो उन्हें कभी माफ नहीं किया था जब लड़की की चाह में उन्हें शरीर के खिलाफ जाकर बार बार गर्भ धारण किया था।सब कुछ था बस परिवार पूरा करना चाह रही थी ।और आज भगवान जब दे रहा तो वे मना कर रही। शायद इतिहास खुद को दुहरा रहा था।उषा जी ने पंकज और मीरा को गले लगा लिया।
दोस्तों!अक्सर हमारे लिए क्या अच्छा होता है हम नहीं जान पाते।हमें ईश्वर की हर बात का मान रखना चाहिए ।

डाॅ मधु कश्यप 

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