अपने ही हो रहे है पराये

अपने ही हो रहे है पराये

वक्त ने आज सबको एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ अपनों की पहचान हो जाए। वैसे इंसान करे भी तो क्या ? ये ख़तरनाक महामारी का स्वरूप ही ऐसा है, जन संपर्क से फैल रही जानलेवा बीमारी है। हर कोई डरा हुआ है, और डरना भी चाहिए पर नियमों में रहकर, खुद को सुरक्षित रखकर आप अपनों की सेवा कर सकते हो, अपनों का जीवन बचा सकते हो।


कई जगह पर देखने को मिल रहा है परिवार में कोरोना संक्रमित होने का पता चलते ही परिवार के लोग किनारा कर लेते है, या अस्पताल में छोड़ जाते है फिर खबर तक नहीं लेते। या तो पता चले की कोरोना संक्रमित की मृत्यु हो गई है तो परिवार में से कोई अंतिम क्रिया के लिए भी आगे नहीं आते, ऐसे में पुलिस या अस्पताल वाले श्मशान ले जाकर मृतात्मा का संस्कार करवा देते है।


इसे इंसान की फ़ितरत कहे, या इंसानियत की मृत्यु। जो अपनें जान से ज़्यादा प्यारे होते है उनको इस हालत में मरने के लिए छोड़ देना कतई जायज़ नहीं। अपनों की परवाह ही इंसान की आधी बिमारी दूर कर देती है। मरना तो एक दिन सबको है पर मौत को भी फ़ख्र महसूस करवाए ऐसा जीवन जी कर क्यूँ न मरें।


जब अपनों को हमारी जरूरत होती है उसी वक्त मुँह मोड़ने की इजाज़त अंतरात्मा कैसे देती है। परिवार का मतलब ही परवाह और परवाज़ है, जो हर मुसीबत में एक दूसरे का साथ देते कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।माना कि ये बीमारी छूने से या संपर्क में आने से फैलती है, पर सुरक्षा के इंतज़ाम भी तो है। डबल मास्क लगाकर, हाथ बार-बार धोकर, सेनेटाइज़ करके आप खुद को सुरक्षित रख सकते है। अस्पताल में पड़े मरिज़ की ख़बर तक ना लेना मरिज़ को शारीरिक और मानसिक तौर पर हरा देता है। परिवार का साथ इंसान में उर्जा का संचार भरता है, हौसला देता है और बिमारी से लड़ने की हिम्मत और ताकत देता है। ये दौर इंसानियत निभाने का है, मानव धर्म निभाने का है मधर टेरेसा इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसने परायों की सेवा में ज़िंदगी अर्पण कर दी। तो ये समय अपनों से दूरी बनाने का नहीं एकजुटता में ताकत है।


है परिवार जो साथ तो हर मुश्किल है आसान। मरिज़ को आधा दवाई ठीक करती है और आधा अपनों की परवाह, प्यार और दुआ जान डालती है। तो इस महामारी को हराने में अपनों के पास रहे साथ रहे तो परिवार अखंड रहेगा।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)

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