असफल बच्चे का जगाएँ आत्मविश्वाश

असफल बच्चे का जगाएँ आत्मविश्वाश

“बच्चों के इन हाथों को चाँद सितारे छू लेने दो-चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे”

दोस्तों आज हम बात करते हैं उन बच्चों की जो किसी भी कारणवश अपने विद्यार्थी जीवन में बहुत अच्छा परिणाम नहीं ला पाते और निराशा से घिर जाते हैं, खुद को कम आँकने लगते हैं।  

विद्यार्थी जीवन सबके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता हैं , चंचल-मन,बड़े-सपने, नाजुक-शरीर और कच्ची-सोच से भरी ये उम्र सब पर आती है लेकिन आजकल ये अपने साथ बहुत सारी चुनौतियाँ लेकर आती है । चुनौतियाँ जैसे कि: पढ़ने को भारी भरकम किताबें, बहुत सारे प्रोजेक्ट्स, प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत, घर परिवार की तरफ से अच्छा परिणाम लाने का दबाव, दोस्तों का मजाक बन जाने का डर, इत्यादि इत्यादि और इस सब के अलावा पेरेंट्स जो अपने अधूरे सपने पूरे करने का ज़ोर बच्चों पर डालते है, एक और अतिरिक्त भार हैं; लेखक बनाना हैं, पेंटिग सीखनी है, क्रिकेट खेले, टेनिस भी आना चाहिए, स्विमिंग तो बहुत जरूरी हैं और बहुत सारी ऐसी चीजें।     

जब हम कभी-कभी ऑफिस और घर के बीच में बैलेंस नहीं बना पाते तो बताइए ये छोटे – छोटे बच्चे क्या करें? क्यों इनके नाजुक कंधों पर इतनी तरह का बोझ हम डालते हैं। 

एक प्रतिस्पर्धा हम बड़े ही मन में पाल कर रखते है और बच्चों को भी उसमे झोंक देते है; उस कज़िन ने कितना स्कोर किया, फलां की बेटी के कितने नंबर आए, मेरे दोस्त के बेटे का IIT मे एडमिशन हो गया। जब भी हम बच्चे के सामने बैठते हैं गुणगान शुरू कर देते है दूसरों के बच्चों का ।

क्यूँ तुलना करते हैं हम अपने बच्चे की किसी से भी। और सब अगर डॉक्टर्स, इंजिनीयर्स ही बनेंगे तो बाकि के काम कौन करेगा।  हमे सोचना होगा कि बहुत तरह के व्यवसाय या करियर ऑप्शन है आजकल। जरूरी नही कि सब बच्चे मैथ्स पढ़े, साइंस ही पढ़े। मैथ्स, साइंस, कॉमर्स, आर्ट्स, स्किल्ड ट्रेनिंग, आईटीआई जो भी बच्चा करना चाहे करने दीजिए ना उसे।

और अब आती हूँ मुख्य बात पर: दोस्तों अगर बच्चे असफल हो जाएँ या मन मुताबिक परिणाम ना ला पाएँ तो आप न खुद निराश हों न ही बच्चे को होने दें। हमेशा याद रखें आपका बच्चे के कंधे पर रखा हुआ हाथ उसमें नए आत्मविस्वाश को जन्म देता है, एक संजीवनी बूटी के जैसे ये उसमें नई ऊर्जा, नई उमंग और सफल होने की नई चाह भर देता है।  

दूर क्यूँ जाते हैं , अपना ही उदाहरण लीजिए ना ; जब कभी हमसे कुछ गलत हो जाता हैं और उसपर बॉस या घर के बड़े चिल्लाने लग जाएँ तो हम कैसे मुरझा जाते हैं और वहीं कोई दो शब्द प्यार से बोल दे कि कोई बात नहीं गलती हो जाती है, तो कैसा अच्छा सा महसूस होता है और उसी काम को हम दोबारा कितने मन से करते हैं । दोस्तों, यही बात बच्चों पर भी लागू होती है , जब अच्छे परिणाम ना आएः तो बताइए उन्हें कि कोई बात नही और मेहनत करो, चलो बैठते हैं , देखते हैं कहाँ कमी रह गई, अगली बार खूब मेहनत करेंगे ना-तुम्हारे लिए कुछ मुश्किल थोड़े ना हैं, हम हैं ना तुम्हारे साथ , बस तुम अपने काम मे ध्यान लगाओ।

किसी भी असफलता को वो सफलता मे बदल देंगे अगर परिवार का साथ होगा।  उन्हें विश्वाश दीजिये, भरोसा दीजिये, हम है ना-ये बताइए और देखिए वो आपसे अपने मन की बात खुद ही कहने लगेंगे।   आप को ढूँढना नहीं पड़ेगा कि किस चीज मे आपका बच्चा अच्छा है बल्कि वो खुद ही आप को अपने इंटरेस्ट, पसंद-नापसंद बता देंगे । 

लेकिन अगर वो आपसे मन की बात नहीं कह पाया, आपसे डरने लग गया या विद्रोह करने लग गया तो ये बच्चे के भविष्य के लिए बहुत नुकसान दायक बन सकता है।  तो दोस्तों चलिए नंबर गिनना छोड़ देते हैं, एक खुला आसमान देते हैं अपने बच्चों को ऊँची उड़ान भरने के लिए, उन्हें अनुशासन देना जरूरी हैं लेकिन आत्मविश्वाश भी बहुत जरूरी हैं। अच्छे बुरे की समझ देना जरूरी हैं तो उन्हें अपनी पसंद-नापसंद चुनने के लिए प्रेरित करना भी जरूरी हैं।

उम्मीद हैं कि आप मेरी बातों से सहमत होंगे, अपने विचार कमेंट बॉक्स मे जरूर लिखिएगा।

मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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