अंतिम सफर

अंतिम सफर

हल्की सर्दियों के दिन थे वो....जब ज़िंदगी के किसी मोड़ पर तुमसे मिलना हुआ था। यूँ लगता हैं जैसे..... कल परसोंं की ही बात हैं। पर बात तो हैं ना इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता।


ये नहीं कहना कि तुमसे ना मिलते तो बेहतर था... बस इतना कहना हैं कि अच्छा था जो जैसा था अच्छा था। 

हर शख़्स से शिकायतें नहीं की जाती.... और मुझ जैसा इंसान शिकायतें हो तब भी कुछ ना कहे ... हर बार कहना जरुरी भी तो नहीं हैं। खामोशीयों को समझना भी तो आना चाहिए ना.... 

इसे रिश्ता की जगह अगर सफर का नाम दे तो बेहतर होगा ना..... किसी तन्हा से ख्याल में उलझे सिलसिलों का सफर रहा हैं ये। किसी के साथ रहकर भी तन्हा रहना क्या होता हैं ...ये बहुत अच्छे से समझ आ गया हैं। 

कितनी जल्दी कह दिया था ना तुमने कि प्यार हो गया हैं तुमसे और ताउम्र रहेगा... तुम्हें देखकर तो किसी को भी प्यार हो जाएगा ... बड़ी आसानी से .....!!

प्यार बड़ी आसानी से हो ही जाता हैं .... मुश्किल होता हैं उसे निभाना। उस शख्स को ये एहसास दिलाना की तुम अकेले नहीं हो.... कोई हैं जिसे तुम्हारी परवाह हैं... किसी और को फर्क पडे़ या ना पड़े पर कोई हैं जिसे बहुत फर्क पड़ता हैं तुम्हारे उदास होने भर के ख्याल से भी... 

प्यार सबसे पवित्र होता हैं। पता हैं क्यों...?? 

क्योंकि यह हमें बिना शक किए भरोसा करना सिखाता हैं। बिना किसी मिलावट के जीना सिखाता हैं। यह कभी हमें किसी फ्रेम में फीट होना नहीं सिखाता... बल्कि यह हमें आजादी देता हैं खुलकर जीने की। 

सब चाहते हैं कि हमारे साथ कोई चले पर अब तो मेरी ये भी ख्वाहिश नहीं हैं। साथ चलना तो दूर..... किसी का साया भी नहीं चाहिए। 

उस सफर को याद कर दिन गुजरते हैं तो यूँ लगता हैं कि कोई मेरी पीठ के घावों को कोई कुरेद रहा हो... और मैं बेबस हूँ... कुछ कर पाने की स्थिति में हूँ। कभी कोई मरहम भी लगा दे तो यूँ लगता हैं कि वो कांटे चूभों रहा हैं... राहतें नही मिलती। 

कुछ यादों के निशान दिल की जमीन पर यूँ रह जाते हैं कि ... लाख कोशिशों के बावजूद वो मिटाए नहीं जा सकते.. 

बारिशें भी उन कदमों के निशानों को मिटाने में नाकामयाब ही रही हैं।

*आसान नहीं हैं भूलना। और उससे भी कही ज्यादा मुश्किल हैं जो भूलना चाहते हैं उसके ख्याल को भी बार बार जेहन में आने से रोकना।*

मन होता हैं कि किसी अंधेरे कमरें में खुद को कैद कर ले,,,,ऐसा किया भी हैं मगर ...सुबह की धूप जब रोशनदान से छनकर बिखरती हैं तो ऐसा लगता हैं कि किसी ने उन यादों की धुंधली परछाई को फिर से रोशनी कर दी हो... और वह मेरी आँखों में चुभ रही हैं...।

कभी किसी घने कोहरे के बीच खुद को गुम होते पाया हैं..... कोई शख़्स आवाजें देता हैं,, बार बार मेरा नाम पुकार कर पर जाना नहीं उस पार। 

ये खूबसूरत आवाजें और चेहरे अक्सर दगा कर जाते हैं। जैसे कि तुमने पहले भी किया था... और अब तक कर रहे हो। 

मेरी आँखें ही मनहूस थी जो सच पहचान ही ना पाई। या यूँ कहूँ कि दगा दे दिया मेरी इन आँखों ने मुझे.... पर अब नहीं। 

सर्दियों का मौसम फिर से आ रहा हैं... वो दिन.. वो वक्त फिर से आ रहा हैं उसी तारिखों पर मगर... साल बदल जाते हैं। कुछ नही बदलता तो वो हैं जख्म ....

हम सब ना टूटे हुए हैं ...अंदर तक बिखर गए हैं पर बदकिस्मती पता हैं क्या हैं...??? हम टूटन और बिखराव को स्वीकार नहीं कर पाते। जिस दिन सहज स्वीकार किया उस दिन से सब बदल जाएगा। 

कोशिश ये भी रहेंगी कि मैं भी बदल जाऊ वक्त के साथ बदलते लोगों और रिश्तों को देखकर पर... मन नहीं मानता... 

 

मन कभी कहता हैं कि तुम्हें बारीकियाँ आनी चाहिए थी झूठ बोलने की,,दगा देने की।

पर मुझे पता हैं ऐसा कभी नहीं होगा। 

मन की तरफ एक जो कभी एक कच्ची सड़क जाती थी.. ... जिस पर तुम्हारी यादों की धूल उडा़ करती थी अब वह सड़क भी गुम हो गई हैं। 

और बेहतर होगा ये अब गुम ही रहे सफर में नहीं जाना अब। 

और कभी हुआ तो ऐसा सफर जिसमें किसी की कोई परछाई नही होगी ना कोई जख्म होगा... ना तन पर और ना ही मन पर। और अंतिम मेरा सफर होगा "मैं" से स्वयं के होने तक का।

सु मन 


#एकइडियटकेडायरीनोट्स 

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