अधूरा परिवार-झूठ या सच ?

अधूरा परिवार-झूठ या सच ?

वैभव जैसे ही विद्यालय से घर लौटा, साक्षी ने बताया, "वैभव जल्दी से अपना होमवर्क खत्म कर लेना शाम को आपकी सारिका मौसी जूही के साथ आएगी और वो दोनों आज रात हमारे घर रहेगी।" सुनते ही वैभव खुश हो गया।

सात वर्ष का इकलौता पुत्र होने के कारण वैभव अक्सर अकेलापन महसूस करता था पर अपनी चार वर्षीय मौसेरी बहन जूही के साथ खेलना उसको बहुत भाता था |

शाम होते ही सारिका और जूही आ गए |घर में तो मानो रौनक आ गयी |दोनों बच्चे खूब धमा-चौकड़ी मचा रहे थे | चाय ले कर बैठे ही थी सारिका और साक्षी कि अचानक वैभव की दादी शीला जी बोल पड़ी, "सारिका! जूही चार बरस की होने को आयी अब कब दूसरे बच्चे के बारे में सोचोगी? इतना अंतर दो बच्चों में अच्छा नहीं होता बाद में बहुत दिक्कत होती है फिर |"

"नहीं आंटी जी! हमे तो बस एक जूही ही काफ़ी है, आजकल महँगाई के इस दौर में एक ही बच्चे की इंसान परवरिश कर ले वहीं बहुत है | मैं और राजीव तो बस जूही से ही खुश है |" मुस्कुराते हुए सारिका बोली |

" तुम आजकल के बच्चे भी ना जवानी में गलत निर्णय करते हो फिर बैठकर बुढ़ापे में पछताते हो | जूही के साथ तुम्हारा परिवार अधूरा है और इसको समय रहते पूरा कर लो | एक लड़की से कभी परिवार पूरा नहीं होता |" शीला जी ने फिर समझाया |

साक्षी ने भी हाँ में हाँ मिलाई पर बात आयी गयी हो गयी |

सारिका और जूही के साथ दो दिन बहुत अच्छे गुज़रे और दोनों चले गए |

सोमवार को वैभव ने निखिल से अचानक सवाल किया," पापा! हमारा परिवार अधूरा है?"

नन्हे वैभव के इस प्रश्न से सारिका और शीला जी भी चौंक गयी |

"नहीं बेटा हमारा परिवार अधूरा नहीं है | आपके पास मम्मी पापा और दादी सब है | फिर आपने ऐसे क्यूँ पूछा?" निखिल ने हैरान हो कर पूछा |

"सारिका मौसी को मम्मी और दादी समझा रहे थे कि जूही अकेले है तो उनका परिवार अधूरा है तो फिर पापा मैं भी तो अकेला हूँ फिर हमारा परिवार भी तो अधूरा हुआ ना? " नन्हे वैभव के प्रश्न ने साक्षी को झकझोर दिया |

उसे स्वयं पर आत्मग्लानि हुई, माना कि सासु माँ पुराने ख़यालात की है परंतु वह तो एक पढ़ी लिखी आधुनिक ख़यालात की महिला है, फिर उसने सासु माँ की सोच में हाँ में हाँ क्यूँ मिलाई | यदि लड़का और लड़की बराबरी पर है तो आखिर क्यूँ उसने भी सारिका को परिवार बढ़ाने पर जोर दिया |

साक्षी तुरन्त वैभव से बोली, "नहीं बेटा! ना हमारा परिवार अधूरा है ना सारिका मौसी का| आज तुम्हारे एक प्रश्न ने मेरी आँखे खोल दी है |"

शीला जी को शायद कुछ समझ ना आया हो पर साक्षी की आँखे आज खुल गई थी |

आधुनिक समय में जहाँ एक ओर तो बेटे और बेटी को समान माना जाता है वहीं दूसरी ओर परिवार में पहली संतान लड़की के होने पर यह मान लिया जाता है कि परिवार अधूरा है और दूसरी संतान अर्थात लड़का होना ही चाहिए | वहीं दूसरी ओर यदि पहली संतान बेटा हो तो उस पर बार बार दबाव डालकर बेटी पैदा करने के लिए कहा जाता है |

परिवार की आमदनी के अनुसार एक या दो संतान का निर्णय लिया जाना चाहिए ना कि बेटे या बेटी के होने के आधार पर |

उम्मीद है कि य़ह स्व रचित मौलिक तथा अप्रकाशित कहानी आपको पसन्द आएगी और आपकी सोच को एक नया नजरिया देगी |

#दिल से दिल तक # पूजा अरोरा

# पिंक एक्सपर्ट 

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