आवाज़- नारी स्वाभिमान की कुंजी

आवाज़- नारी स्वाभिमान की कुंजी

बेटी घर में जन्म लेती है, हँसती-खिलखिलाती है पूरा घर आँगन महकाती है। फिर बचपन की दहलीज पार करते-करते आहिस्ते-आहिस्ते उसे चुप्पी का खास सबक सिखा कर अलग अस्तित्व में ढ़ला जाता है। हवाओं में जो हँसी गूँज रही होती है उसे पल-पल मर्यादा के रस्सियों से जकड़ा जाता है। जो हवाओं संग कुलाँचे भरना चाहती है उसके आगे रेखाएँ खींच दी जाती है। किशोर होते मन के हर सवाल का एक ही जवाब "चुप्पी"! किशोर होती बिटिया के शारीरिक संरचना में होते अथाह परिवर्तन और वह दिन जब वह मासिक धर्म की दहलीज तक पहुँच जाती है। मन सवालों से भरा होता है, और माताएँ उन्हें सबक सिखाती है...."श्श्श..!!! किसी को बताना नहीं, दर्द जताना नहीं, दाग दिखाना नहीं।" बेटी फिर अपनी नन्हीं उँगली अपने होंठों पर रख लेती है। वक्त नहीं लगता और धीरे-धीरे यह चुप्पी संस्कार का रूप ले लेती है।

इस खामोशी की दास्तान कितनी पुरानी है कहना मुश्किल है। लेकिन अब यह खामोशी घुटन बन मन बेचैन करने लगी है। नई पीढ़ी को बोलना पसंद है, ललकार का सामना करने को वह तत्पर हैं और हर एक रूढ़ी के खिलाफ बगावत की आवाज उठाने को तैयार हैं। तो क्यों ना हर चुप्पी को तोड़ा जाए, हर पट्टी को खोला जाए।

इस चुप्पी के नींव पर ही पितृसत्ता की बालाशाली इमारत खड़ी है। समाज सदियों से पुरुषप्रधान बना हुआ है क्योंकि स्त्रियाँ त्याग और पद की चाह को अपने नारीत्व की शालीनता के पल्लू से ढ़के रहने की आदी हो चुकी हैं। स्त्री जीवन में "त्याग" की महत्ता का जो गुणगान शुरू से बताया गया है वह "चाह" के स्वर को दबाती है। संभवतः इसलिए स्त्रियों जीवन में चुप्पी को प्रमुखता दी गई है ताकी पुरुषसत्ता सुरक्षित रहे। स्त्रियाँ बोलेंगी तब चर्चा होगी, तर्क होगा, सही-गलत के इस आँकलन में एकतरफा सामाजिक संरचना आखिर कब तक टिकी रहेगी? इसलिए महिलाओं केलिए मानक मर्यादाएँ निर्धारित की गई। यदि इन मानकों में वाकई दम है तो समाज मर्यादा का यही पाठ बेटों को क्यों नहीं पढ़ता?

हम आज भी बेटियों केलिए उस निर्भीक माहौल को तैयार करने में असमर्थ रहे हैं जिसमें एक बेटी खुल कर बात कर सके। वह किसी प्रताड़ना का भी शिकार होती हैं और हिम्मत कर अपने अभिभावक से इस संदर्भ में बात भी करती है तो जवाब वही मिलता है "शश्श... आहिस्ते...! किसी ने सुन लिया तो बहुत बदनामी होगी।" हमारी सोच से शोषक और बड़ा शोषक बन कर उभरता है और पीड़ित और दबती चली जाती है। सह कर, चुप रहकर परिस्थिति को बदलने की नसीहतें भले एक दिन बेटी को चिताग्नि में धकेल दें, लेकिन आवाज नहीं उठानी चाहिए।

"लोग क्या कहेंगे, समाज क्या सोचेगा" यह सोचते-सोचते हम अब तक चुपचाप रहे। लेकिन सच तो यह है कि हम बोलेंगे तभी सही गलत पर चर्चा होगी और परिवर्तन की चहल-पहल शुरू होगी। आवाज़ की जो यह ताकत है सखियों कि वह बड़े-से-बड़ा साम्राज्य हिला देती है। यह आवाज़ हमारी भी ताकत है हर नारी के स्वाभिमान की कुंजी है उनकी निर्भीक आवाज़। तो चलिए हम चुप्पी तोड़े... हक़ केलिए बोलें।

✍ रागिनी प्रीत

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