आज़ादी का नायक

आज़ादी का नायक

बापू गाँधी को प्रणाम 

सीधा साधा सोटी वाला 

खद्दर और लंगोटी वाला 

सच्चाई के थे वे दूत

सदा हाथ से काता सूत 

बचपन में पढ़ी कविता की इन पंक्तियों से ही हमें गाँधीजी के व्यक्तित्व का आभास हो जाता है । एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिनका नाम जहन में सबसे पहले आता है। उनके इस प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही आज भी देश का प्रत्येक व्यक्ति उन्हें आदर व सम्मान से याद करता है ।

क्या इनका नाम बचपन से ही महात्मा गाँधी था….. नहीं …. नका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में कर्मचंद गाँधी जी के यहाँ हुआ । तब इनका नाम मोहनदास रखा गया था। 

इनके पिता कर्मचंद गांधी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी-सी रियासत पोरबंदर के दीवान थे। इनकी माता का नाम पुतलीबाई था जो कि आध्यात्मिक , धार्मिक प्रवृत्ति की थी और नियमित रूप से व्रत व पूजा-पाठ करती थी । माता के इन्हीं मूल्यों ने आगे चलकर मोहन दास के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसी कारण अहिंसा, शाकाहार, आत्म शुद्धि के लिए व्रत और विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान जैसे गुणों से वे अलंकृत हुए। 

1883 में इनका विवाह कस्तूरबा से करा दिया गया इनके चार पुत्र हीरालाल , मणिलाल , रामदास व देवदास हुए। 

गाँधी जी की मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई । सन 1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की और इसके बाद भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया परंतु खराब स्वास्थ्य व गृह वियोग के कारण कॉलेज छोड़ कर पोरबंदर वापस चले गए ।

पिता की मृत्यु के पश्चात् उनके एक पारिवारिक मित्र ने ऐसी सलाह दी कि यदि मोहन दास लंदन से बैरिस्टर बन जाएँ तो उन्हें आसानी से दीवान की पदवी मिल सकती है । तत्पश्चात् वे कानून की पढ़ाई करने इग्लैंड चले गए।

जून 1891 में भारत लौटने पर उन्हें माता की मौत के बारे में पता चला। वकालत में सफलता न मिलने पर गाँधी जी 1893 में एक भारतीय फर्म के साथ एक वर्ष के करार पर दक्षिण अफ्रीका चले गए । दक्षिण अफ्रीका में उन्हें नसली भेदभाव का सामना करना पड़ा । 

एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की टिकट होने के बावजूद , तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इंकार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। इस घटना से उनके जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। 

दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने भारतीयों को अपने राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया । 

सन 1914 में गाँधी जी भारत वापिस लौट आए । वे एक उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर ही भारत आए थे। शुरुआती दौर में गांधीजी के विचार बहुत हद तक गोखले जी के विचारों से प्रभावित थे। प्रारंभ में गाँधी जी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया और राजनीतिक , आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश की । गाँधीजी के आचार-विचारों के कारण ही इन्हें महात्मा की उपाधि दी गई ।

बिहार के चंपारन और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने गाँधीजी को भारत में पहली राजनीतिक सफलता दिलाई । इस समय तक गाँधीजी का रुतबा  एक वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी का बन चुका था ।

कांग्रेस के अंदर और मुस्लिमों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का मौका गाँधी जी को खिलाफत आंदोलन के जरिए मिला जो कि एक विश्वव्यापी आंदोलन था । भारत में खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व ऑल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के द्वारा किया जा रहा था । धीरे-धीरे गाँधी इसके मुख्य प्रवक्ता बन गए। इसके बाद गाँधी जी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिनका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर था।

गाँधी जी द्वारा चलाए गए आंदोलनों में  असहयोग आंदोलन, नमक आंदोलन ,सत्याग्रह आंदोलन ,स्वराज आंदोलन ,हरिजन आंदोलन , भारत छोड़ो आंदोलन आदि ऐसे आंदोलन थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव को हिला कर रख दिया था ।

सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1944 में रंगून रेडियो से गाँधीजी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया था जो कि आज भी बरकरार है । गाँधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के कारण 15 अगस्त 1947 को भारत देश को ब्रिटिश सरकार से आजादी मिली। 

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के बिरला हाउस में शाम 5:17 पर नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी । उस समय गाँधी जी प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे । उनके मुख से निकलने वाले अंतिम शब्द थे -हे राम ।

सत्य अहिंसा के पुजारी , आत्म शुद्धि पर बल देने वाले, मेहनत करने के लिए प्रेरित करने वाले , स्वच्छता का पाठ पढ़ाने वाले व देश भक्ति की भावना जगाने वाले इस महान स्वतंत्रता सेनानी को हमारा शत-शत नमन । भारत इनको युगों-युगों तक याद करता रहेगा ।

मधु धीमान

कैथल(हरियाणा)

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