बदलता मौसम बदलते रिश्ते

बदलता मौसम बदलते रिश्ते

किसी ने कहा मौसम है सर्द 

चलो कुछ पल धूप में बिता लें 
लगी है सीलन जो अहम की रिश्तों में
बैठें थोड़ी देर संग-साथ वो शिकवे मिटा दें
हाँ बहुत दिल करता है धूप में गुनगुनाने को
रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने को
पर अब धूप में भी आँख मिचौली है
मूँगफली चटकाये कौन बादामों ने जगह जो ले ली है
भागमभाग है जिंदगी सब बहुत व्यस्त हैं
मन का कोना कहता भी ठहर पल दो पल
पर सब रेस में अभयस्त हैं 
तिल का ताड़ अब बेशुमार बनता है
कौन कहाँ अब किसी की सुनता है
मिठास गज़क औ गुड़ की नट्स में समाई है
न रिश्तों में मिठास है न ही कुछ समयाई है
"मैं " नही कुछ भी पर "अहम" ने घेरा है
अब रजाई की जगह नर्म कम्बलों का डेरा है
न भरावन है न धूप है न ही लिहाफ़ की तुरपाई है
रिश्तों में भी कहाँ गरमाहट बस निभाने पर बन आई है
बहुत कुछ बदल गया मौसमों के हिसाब से पर
 नही बदला नजरिया सारिका का जिंदगी की किताब से।।
स्वरचित-सारिका रस्तोगी
अम्बालाकैंट
#कविता

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