बदलते परिवेश में सेक्स और प्रेम का बदलता स्वरूप

बदलते परिवेश में सेक्स और प्रेम का बदलता स्वरूप

आज के दौर में प्रेम और सेक्स के मायने बदल गए हैं। मुझे ये महसूस होता है कि इस इकीसवीं सदी में युवा सेक्स को ही प्रेम समझते हैं। वो दौर जाने कहाँ चला गया जब राधा और कृष्ण के प्रेम को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

पवित्र प्रेम का इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं मिल सकता। कहने को तो रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी थीं लेकिन लोग हमेशा कृष्ण के साथ राधा का ही नाम लेते हैं।

आज भले ही सेक्स को टैबू नहीं माना जाता हो लेकिन अब भी हमारे देश की संस्कृति जाने अनजाने युवाओं में जीवन के चार आश्रमों के महत्व को समझा देती है।

प्रेम एक पवित्र रिश्ता है जिसका सेक्स से कोई संबंध नहीं है। ये दो आत्माओं का बंधन है जो दूर रह कर भी एक दूसरे के सुख दुख की अनुभूति करा देता है।

सेक्स का एक दूसरा पहलू भी है पहले सिर्फ़ वंशबेल को आगे बढ़ाने के लिए इसको महत्व देते थे। आज के दौर में या यूँ कहें की मध्यकालीन सभ्यता के साथ साथ इसके स्वरूप में परिवर्तन नज़र आने लगा था।

आधुनिक युग में इसने स्वछंदता का रूप ले लिया है। अब यूँ लगता है कि युवाओं के आँखों में न लिहाज़ न शर्म का नामोनिशान बाकी रह गया है।

हिन्दू परम्परा के अनुसार सेक्स वह क्रिया है जो विवाह होने के बाद पति-पत्नी के बीच बनते है उसे पवित्र माना जाता है।यहाँ एक और भी बात गौरतलब है की सभी वैवाहिक जोड़े के बीच के संबंध समर्पण के भाव से होते हैं। कई बार यूँ भी होता है की सालों -साल साथ रहने के बाद भी …सभी रिश्ते कायम होने के बाद भी प्रेम नहीं होता।

लोग साथ रहते हैं बिना प्रेम के भी क्योंकि हमारा सामाजिक बंधन ऐसा है की लाख असमानताओं के बाद भी उस बंधन को कोई तोड़ना नहीं चाहता। प्रेम समर्पण चाहता है दिखावा नहीं। जबरदस्ती भी नहीं । ये खुद ही समर्पित हो जाता है। बिना किसी आशा या अपेक्षा किये।

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