बदलाव और मेरा आसंग

बदलाव और मेरा आसंग

माता पिता के प्यार से भरा बचपन
किलकारियाँ जैसे ओस के स्वर्ण कण

समय के बदलाव ने छुड़वाया लड़कपन
और तराशा मेरा लहलहाता यौवन

मनचाही बयार सी बहती,फिसलते सम्भलते तूफानों से झुझती
भविष्य के धुंधलेपन में भी,बदलाव के संगत में,

रोमांच को हर पल जीती
फिर एक दिन,इसी बदलाव ने बनाया मुझे नवपरिणीत

दो विपरीत स्वरों से बनाया एक मधुर संगीत
कांटों का झुरमुट हो,या दुखों के जाले

बदलाव के आसंग ने निभाया साथ,हर मोड़ पर मुझे संभाले
काली स्लेट पर सफेद चाक सी कहूँ,

या स्वच्छ धवल में घुलता केसरी रंग
कुछ ऐसा ही है बदलाव और मेरा आसंग।

सुषमा त्रिपाठी

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