बचपन की मनमर्जियां #तेरा मेरा बचपन

बचपन की मनमर्जियां #तेरा मेरा बचपन

अपना बचपन याद आते हीं हम अपने अतीत में खो जाते हैं। बचपन की शरारतें , अठखेलियां , मौज , मस्ती और मनमर्जियां सब कुछ आंखों के सामने घूमने लगता है‌। मुझे लगता है उम्र के सभी पड़ाव में बचपन ही ऐसा पड़ाव है जहां हम बिना किसी चिंता के अपना जीवन खुल कर या यूं कहें बिंदास होकर जीते थे। हमारे बचपन में सुख सुविधाएं भले ही ज्यादा नहीं थी पर खुशियां ,मन का सुकून बहुत ज्यादा थी।


अगर मैं अपने बचपन की तुलना अपने बच्चों के बचपन से करती हूं तो मैं यह पाती हूं कि मेरे और मेरे बच्चों के बचपन में कुछ समानताएं भी हैं और कुछ असमानताएं भी।


समानताएं...मां का दुलार , प्यार और चिंता...समय कितना भी क्यों ना बदल जाए पर एक मां की चिंता हमेशा बरकरार रहती है। मेरे बचपन में मां हमें पढ़ाई-लिखाई या खेल कूद को लेकर कभी हमें नहीं डांटती पर मैं हमेशा अपने बच्चों को पढ़ाई और खेल दोनों का महत्व समझाती।


बिंदास होकर हम अपू दोस्तों के घर चले जाते पर हम अपने बच्चों को ऐसा बिल्कुल नहीं करने देते।


मेरे बचपन में मोबाइल नहीं था , था तो केवल परिवार का साथ , सखी , सहेली , गुड्डे-गुड़ियों का खेल और दादी नानी की कहानियां...जबकि मेरे बच्चों का ज्यादातर समय पढ़ाई , कभी कभी टीबी देखने में तो कभी वीडियो गेम खेलने में निकल जाता।


मेरे बचपन के जब मैं देर होती तो मम्मी को मेरे खाने पीने की चिंता ज्यादा सताती थी पर आज हम मम्मियों को बेटियों के साथ कुछ ग़लत ना हो जाए कोई अवांछनीय घटना ना घट जाए सोच कर मन घबराता है।


मेरे बचपन में हमारे पास सब कुछ के लिए समय था , क्योंकि हमारे समय को बांटा नहीं गया था।पर आज बदलते समय के साथ हमने अपने बच्चों के लिए समय सीमा तय कर दी गई है कि कब पढ़ना है ,कब खेलना है और अन्य काम करना है। मेरे बचपन में ऐसा बिल्कुल नहीं था।


पहले की अपेक्षा आज कल के बच्चों का बचपन बहुत बदल गया है क्योंकि किसी का भी बचपन माता-पिता के सोच और उनकी परवरिश पर निर्भर करता है।


#तेरामेराबचपन

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