बेटा ही क्यों ?

बेटा ही क्यों ?

परम्परा... कही गुलाब की खुश्बू तो कही काँटों की चुभन..., कहीं आँखों में आँसू तो कहीं लबों पर मुस्कान..। शब्द एक हैं भाव अनेक हैं..।

कई जगह, विवाह के बाद जब वधू ससुराल आती हैं... उसकी आरती कर कोहबर... (जहाँ विवाह शुरू होने से पहले रस्में होती हैं..।) में वधू को बैठाया जाता,.. वहीं कँगना खिलाते हैं..। दूध, पानी और गुलाब की पत्तियों से भरे थाल में कँगना खिलाया जाता हैं..। उसके बाद वधू की गोद में लड़का ड़ालते हैं, ये माना जाता की, पहला बच्चा लड़का होगा..। वधू उस बच्चें को कुछ नेग देतीं हैं.।

नीता की चचेरी बहन कंचन के बेटे की शादी थी... हँसी खुशी और ढेरों रीत -रिवाज़ के साथ शादी हुई.... बहू को ले सब घर आ गई..। कँगना खिलाने के बाद.. अनिल तो बाहर निकल गया पर नेहा को वहीं बैठना था थोड़ी देर .., बुआ सास आई, बोली कुछ देर यहीं आराम से बैठो..। नेहा की सासुमां बोली भी,कि अकेली क्यों बैठेगी... बताया गया ये भी रस्म हैं... फिर बच्चा ढूढ़ा जाने लगा..। लड़की तो छोटी मिली पर लड़का नहीं मिला... नीता ने चचेरे भाई कि सात माह कि बेटी ला कर बहू कि गोद में डाल ही रही थी कि कंचन ने रोक दिया क्या कर रही हो..?  ये लड़की हैं.. मुझे लड़की नहीं डलवाना.. कह हाथ जोड़ दी... नीता बोली भी दीदी इस मासूम को देखिये.. कितनी प्यारी हैं..., और लड़की होने से क्या होता..। कंचन हाथ जोड़ बोली तु अपनी बहू की गोद में लड़की डलवाना... मुझे छोड़ दो....।

थोड़ी देर बाद देखा कंचन ने अपने छोटे बेटे को, जो बहू की उम्र का था,.. उसे बहू की गोद में बैठा दिया... बहू की कुछ औरतों ने पूछा तुम्हारी गोद में क्या हैं... बहू बिचारी संज्ञा शून्य हो गई थी.. उससे कहलाया गया, बोलो बेटा हैं..।

दूर खड़ी नीता सोच रही थी.। सब पढ़े -लिखे हैं, पर जब सोच ही नहीं विकसित हुई तो पढ़ने -लिखने का फ़ायदा क्या..। कब हम इन फालतू की परम्परा को तोड़ पाएंगे... ऐसी परम्परा को करने से क्या फ़ायदा, जो सामने वाले की आँख में आँसू ला दे..। एक निश्चय ले लिया उसने... अपनी बहू की गोद में बेटी ही बैठाउंगी..।

इतना बड़ा लड़का गोद में डालने के बावजूद.. कंचन की बहू को तीन बेटियां ही हुई...। दोस्तों आप को क्या लगता कंचन ने सही किया... एक मासूम बच्ची को छोड़ कर बहू की उम्र के बेटे को भाभी की गोद में बैठना उचित था..।क्या परम्परा निभाने के लिए सही, गलत कुछ सोचना नहीं..।

--संगीता त्रिपाठी 
  

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