जब बेवकूफ बनने दिया मुझे किचेनक्वीन का ताज़"

जब बेवकूफ बनने दिया मुझे किचेनक्वीन का ताज़"
टाइटल पढ़कर आप सबको लग रहा होगा कि बेवकूफ बनकर कोई ये ताज़ कैसे जीत सकता है ! एक नईनवेली दुल्हन भला क्यूँ बेवकूफ का तमगा अपने सर पहनेगी,,,जानने के लिए पढ़िये ये पूरा किस्सा,,,,।
हर लड़की की तरह मैने भी सोंचा था कि ससुराल में मैं भी इस कहावत  पर अमल करूँगी कि "पति के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है"।ससुराल में सासू माँ का हांथ बटाकर और अपने सो कॉल्ड कुकिंग कोर्स  की नई नई डिशेज बनाकर सबके मन को मोह लूँगी,,,,,परररर नही इतना आसान थोड़े ही था यहाँ तो पासा एकदम उल्टा था।यहाँ तो पतिदेव की चम्मच और गिलास तक में च्वाइस थी जैसे ही पहली बार मैं रसोई से उनको पानी देने गई ,सासू माँ ने प्यार से हिदायत दी "बेटा वह ये वाला गिलास ही यूज करता है,,,,,हूँउउउउउउउ,,,,,पानी तो पानी बस साफ़ होना चाहिये,,पर नही ! ऐसे ही नाश्ते में ब्रेड बटर लगा रहीं थीं सासू माँ तो बटर एकदम फ्लैट कहीं से ऊपर नीचे नहीं,,,,,रे बाबा,,हमारे यहाँ तो जैसे मरजी लगा लो बस बटर लगना चाहिये ,बड़े एटीकेट्स हैं खाने में ! यही सोंचकर मैने खुद को समझाया -बेटा रसोई में अपनी पारंगता बाद में दिखाना पहले थोड़ा सा यहाँ का तरीका समझ लो।तो बस फिर एक महीने तो माँ ने ही रसोई में प्रापर काम नही करने दिया और जब लंच का वक्त होता मैं कपड़े धोने और ऊपरी काम में लग जाती।
पहली विदा में मायके आयी तो एक सहेली भी आयी थी। बात आई ससुराल में कितनी तारीफ़ मिली।मैं हमेशा से सीधी बात करने वाली ,,जहाँ मेरी सखी बखान कर रही थी कि उसने ये ये बनाकर खिलाया सबने उसकी इतनी तारीफ़ करी।पूरी ससुराल में उसकी वाही वाही है।मुझसे पूछा तो मैने कहा यार मैं तो ऊपरी काम कर लेती हूँ ,माँ सारी तैयारी करती है रसोई में मैं फुल्के सेंक लेती हूँ,,,,सुनते ही सब बोले "बेवकूफ लड़की"बता,,,,, सारा दिन लगी भी रहती है और नाम भी नही। मैं भी मुस्कुरा दी,,अब क्या बताऊँ कि कभी कभी माहौल के हिसाब से "बेवकूफ" बनना भी कितना जरूरी है।
अब आप सोंच रहीं होंगी कि फिर मैंने खाना बनाना कब शुरू किया  ,,,,बनाया भी कि नही ! मेरी तो अच्छीखासी चौप हो गई ससुराल में !नही सखियों,,,जनवरी में मेरी शादी हुई। शुरू का समय घूमने फिरने में निकला और मायका आना जाना।मई में जब मेरी नन्द रानी आईं तो मैने सबसे पहले अपना फेवरेट  'साँभर डोसा' बनाकर खिलाया।ससुराल में पहली बार डोसा घर में बना था।घरवालों का टेस्ट अब तक मैं बखूबी समझ चुकी थी।सबने खूब तारीफ की।अब तो रोज़ मैं अपनी सीखी हुई डिश बनाने लगी और जाते वक्त मेरी नन्द जी ने मुझे "किचेन क्वीन "कह कर पुकारा।
तो सखियों हमेशा समझदार और खुद को होशियार साबित करना ही सही नही रहता कभी कभी "बेवकूफ बनने में भी समझदारी होती है।" 
सारिका रस्तोगी
अम्बाला कैंट

What's Your Reaction?

like
4
dislike
0
love
1
funny
0
angry
0
sad
0
wow
1