कभी कभी बच्चे भी हमें ऐसा पाठ पढ़ा जातें हैं #बच्चे मन के सच्चे

कभी कभी बच्चे भी हमें ऐसा पाठ पढ़ा जातें हैं  #बच्चे मन के सच्चे

हमारा पूरा जीवन,कुछ न कुछ सीखते हुए ही बीतता है। ये बात भी सच है कि कभी कभी बच्चे भी हमें ऐसा पाठ पढ़ा जातें हैं...जो कोई बहुत ज्ञानी भी न पढ़ाया होता है।

बात तब की है,जब मेरा बेटा छठी कक्षा में था। पतिदेव का तबादला एक छोटे शहर में हुआ था,लेकिन वहां का माहौल मुझे खूब रास आने लगा था क्योंकि बेहद अपनापन था वहां के लोगों में।

मुझे मेड भी बहुत अच्छी,सीधी साधी मिल गयी थी। उसके साथ उसकी दस वर्षीय बेटी 'रन्नो'भी आती थी। मैंने उसकी बेटी से काम कराने को साफ मना कर दिया था। शुरू में तो वो बैठ जाती। फिर मेड ही बोलने लगी,कि अगर काम नहीं करवाएगी तो सीखेगी कैसे??? फिर धुले बर्तनों को स्टैंड में लगाने का काम बस मैं करने देती उसे।

मैं अक्सर बचा हुआ खाना उसे दे देती थी। गर्मियों के दिन थे । बाजार से तरबीज और खरबूजे आये हुए थे। शाम को जब तरबूज काटा,तो थोड़ा खराब था,उसमें महक सी आ रही थी। बेटा बोला,इसे फेंक आऊं?? तो मैंने कहा,"नहीं... फेंकेंगे क्यों...सुबह महरी आंटी को दे देंगे...वो और रन्नो कहा लेंगी"।

तब मेरा बेटा बोला,"मम्मी...ये खराब तरबूज आप हमें नहीं खाने दे रहीं हैं...कि हमे नुकसान कर जाएगा..फ़ूड पायजनिंग हो जाएगी...तो क्या आंटी या रन्नो को नहीं होगी??? वो लोग सड़ा हुआ भी खा लेते हैं"????

बेटे ने ये बात सामान्य तौर पर ही कही थी...लेकिन मुझे बहुत बड़ा पाठ सिखा गई...कि सच बात है...ये लोग भी इंसान ही हैं। वे तो बीमार पड़ेंगे तो इलाज के लिए पैसे जुटाना भी उनके लिए मुश्किल होगा। उस दिन के बाद से मैंने खराब चीजें उसे या किसी भी मेड को कभी भी नहीं दी। ये बात अलग है,कि कई बार ज्यादा बच जाने पर खाद्य पदार्थ मैं उसे देती कि किसी गाय या कुत्ते को खिला दे.... उसे लगता कि वो उसके खाने लायक है,तो वो खुद ही खा लेती,या अपने घर ले जाती।

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