भगत सिंह जयंती- फांसी पर चढ़ने से पहले,भगत सिंह का पत्र पिता के नाम

भगत सिंह जयंती- फांसी पर चढ़ने से पहले,भगत सिंह का पत्र पिता के नाम


अक्‍टूबर, 1930 में भगत सिंह ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी। पिता ने लाहौर केस में भगत के बचाव-पक्ष के लिए स्‍पेशल ट्रिब्‍यूनल को एक आवेदन भेजा था। बेहद सख्‍त लहजे में लिए गए इस खत में यह महान क्रांतिकारी एक बेटे के रूप में सारी भावनाएं उड़ेल देता है।

भगत सिंह लिखते हैं-


पूज्य पिताजी,

नमस्ते-


महज 23 साल की उम्र में वो लिखते हैं "बेटा होने के नाते आपकी भावनाओं का सम्‍मान करता हूं लेकिन बिना मुझसे सलाह-मशविरा किए ऐसा आवेदन करने का आपको कोई अधिकार नहीं था।" भगत की लेखनी और तीखी हो जाती है। वो कहते हैं, "मुझे डर है कि आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निंदा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएं न लांघ जाऊं और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हों जाएं।"

मेरी ज़िंदगी, सबसे ऊंचे मकसद यानी आजादी-ए-हिंद के नाम हो चुकी है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और ख्वाहिशों की चाह नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे देश के काम के लिए दान कर दिया जाए। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं।


यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था। मैं यह कहना चाहता हूं कि आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं। मैं जानता हूं कि आप भी इतने ही देशप्रेमी हैं, जितना कोई और व्यक्ति हो सकता है। मैं जानता हूं कि आपने अपनी पूरी ज़िंदगी भारत की आजादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई, यह बात मैं समझ नहीं सकता।


अंत में मैं आपसे, आपके दोस्तों और मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेनेवालों से यह कहना चाहता हूं कि मैं आपके इस कदम को नापसंद करता हूं। मैं आज भी अदालत में अपना कोई बचाव पेश करने के पक्ष में नहीं हूं। अगर अदालत हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकरण आदि के लिए पेश किए गए आवेदन को मंजूर कर लेती तो भी मैं कोई स्पष्टीकरण पेश नहीं करता।



भूख हड़ताल के दिनों में ट्रिब्यूनल को जो आवेदन-पत्र मैंने दिया था और उन दिनों में जो साक्षात्कार दिया था, उन्हें गलत अर्थों में समझा गया है और अखबारों में प्रकाशित कर दिया गया कि मैं स्पष्टीकरण पेश करना चाहता हूं। हालांकि मैं हमेशा स्पष्टीकरण पेश करने के विरोध में रहा। आज भी मेरी यही मान्यता है, जो उस वक्त थी। बोस्टर्ल जेल में बंदी मेरे साथी इस बात को मेरी ओर से गद्दारी और विश्वासघात ही समझ रहे होंगे। मुझे उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका भी नहीं मिल सकेगा।

मैं चाहता हूं कि इस बारे में जो उलझनें पैदा हो गई हैं, उनके बारे में जनता को असलियत का पता चल जाए। इसलिए आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप जल्द-से-जल्द यह चिट्ठी प्रकाशित कर दें।


आपका आज्ञाकारी

भगत सिंह

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