भक्तिरस,वात्सल्यरस,अद्भुत रस

भक्तिरस,वात्सल्यरस,अद्भुत रस

भक्ति रस, वात्सल्य रस और अद्भुत रस का संगम


भक्ति रस-

परम् पावन है व्रज भूमि लिया अवतार हरि ने है,

भक्तिवश कीन्ही लीला फिर लगे माटी को चखने है,

लकुटिया हाथ ले मइया ने जब कान्हा को डांटा है,

रचयिता सारी सृष्टि के भगति वश लगते रोने है।


अद्भुत रस-

खड़े है मौन मनमोहन बहे दृग अश्रु धारा है,

दिखाया मुँह जब माता को दिखा ब्रह्मांड सारा है,

हुई विस्मित यसोदा माँ अलौकिक दिव्य दर्शन कर,

खुले उर ज्ञान चक्षु जब दिखा अद्भुत नजारा है।


वात्सल्य रस-

हटा माया का पर्दा जब हृदय वात्सल्य रस आया,

उठाया गोद मोहन को भाव ममता का भर आया,

लकुटिया फेंक दी माँ ने लगी स्नेह बरसाने,

किये जो दिव्य दर्शन थे कभी न याद वो आया।


भक्ति रस-

हृदय कमला कमल मधुकर ब्रह्म बैकुंठ के वासी,

यसोदा प्रेम वश प्रगटे हुए गोकुल के वो वासी,

दिया सुख गोपी ग्वालों को अनेकों की है लीलाएं,

बसे राधा हृदय में ज्यों भ्रमर मकरन्द अभिलाषी।


शीला द्विवेदी "अक्षरा"

उत्तर प्रदेश "उरई"

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