"भूख की कहानी"

"भूख की कहानी"

ये भूख की कहानी है सदियों पुरानी,

जब इस सृष्टि में मानव ने जन्म लिया, 

तो उसके साथ इस भूख ने भी जन्म लिया।

क्या राजा-महाराजा,क्या प्रजा-नागरिक।

सबका पेट भरने के लिये सजती थी थाली,

बिना अन्न-गृहण ना होता किसी से कार्य।

सबके दो जून की रोटी के लिये,करते थे किसान अन्न की पैदावार।

समय बदला पर इस भूख की किस्मत ना बदली,

खान-पान के साथ भूख ने भी करवट ली।

जनसँख्या बढ़ी खाने वाले बढ़े,और बढ़ी चरम पर मंहगाई।

क्या गाँव क्या शहर, तरक्की-विकास हर जगह हुआ,

पर गरीब के नसीब में भूख ही मिला।

कुछ आपदाओं ने,कुछ मज्बूरोयों ने,इस भूख की सीमा है बढ़ा दी।

भूखे-बिलखते बच्चे किसी को नजर नहीं आते,

कोई अन्न के लिये तरसता,कोई फिजूल खाने की बरबादी है करता।

मैनें देखा है कचरे  में खाना ढूंढते बच्चे,

हाँ मैनें देखा है भूख से रोते बच्चे।

पानी से है भर लेते पेट अपना या जूठन थाली से एक निवाला ले जाते मुँह अपने।

है प्रार्थना बस उस प्रकृति-ईश्वर से,हर बच्चे को खाना नसीब हो।

क्या बच्चे क्या बड़े किसी का भी इस भूख से सामना ना हो।

भूख की कहानी बस यूँ ही चलती रहेगी,

इसकी प्रवृत्ति कभी नहीं बदलेगी।

#भूख

--नीतू श्रीवास्तव (उत्तर-प्रदेश)



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