भाषा का चक्कर # मजेदार रेल यात्रा

भाषा का चक्कर # मजेदार रेल यात्रा

हम करीबन 10 चचेरे ममेरे भाई बहन, जिनमें दो चचेरे मामा, जो हमारी ही उम्र के थे एक शादी में सम्मिलित होकर वापस आ रहे थे ।हर छोटी छोटी बात का मजाक बनाना,दिल खोलकर हंसना, मस्ती खोरी यही खासियत थी हमारी टोली की।गाड़ी बिहार से निकल रही थी तो सभी हिंदी भाषी ही डिब्बों में भरे थे। लंबा सफर ना था हमारा। कुछ घंटों का ही सफर।


जैसे ही भाइयों को बैठने की जगह मिली ताश खेलने बैठ गए। हम 6/7 को सीट ना मिली ,खड़े रहे। रात भर सोए नहीं थे मुश्किल से एक घंटा मिला तो जिसे जहां जगह मिली पसर गए थे।


इतने में मामा जी की नजर ट्रेन के ऊपरी बर्थ पर सोए एक व्यक्ति पर पड़ी जिसके सिरहाने दो फोल्डिंग कुर्सियां भी थी। अपनी मातृभाषा तमिल में कहा इस व्यक्ति को खींचकर एक चांटा मारकर उठाते हैं और उसकी कुर्सियों डालकर हम बैठते हैं ।हम सभी का जोरदार ठहाका लगा ।


सामने की सीट में बैठे गुजराती वृद्ध दंपति ने अपना नाश्ता निकाला ।रोटी ,सब्जी ,नमकीन ,मिठाइयां अचार आदि देख हमारी ही टीम में से किसी ने फिर से तमिल में कहा "चलो ,हम लोग भी उनसे शेयर कर खाते हैं। देखते ही मुंह में पानी आ रहा है ।


लालची कहीं का !!किसी ने कहा। टोली के अन्य सदस्य जोर-जोर हंसने लगे ।इतने में ही गुजराती वृद्धा ने तमिल में कहा "आ जाओ बच्चों ,थोड़ा थोड़ा तो चखने मिल ही जाएगा "।सभी को सांप सूंघ गया ।फिर जोर का ठहाका लगाते पूछा" आप तमिल जानती हैं" ?उन्होंने कहा,"हां हम चेन्नई में बस गए हैं ।वहां हमारा बिजनेस है ।उनके साथ फिर अच्छी खासी दोस्ती हो गई।


इतने में ऊपर जो व्यक्ति सो रहा था उसका स्टेशन आ गया।अपनी कुर्सियों को लेकर जाते जाते उसने हंसते हुए कहा "इस कंपार्टमेंट में आप लोग ही सिर्फ तमिल भाषी नहीं है, मैं भी हूं और चांटा मारने के बजाय आप यूं ही मांगते तो मैं दे देता कुर्सियां बैठने के लिए।


पहले तो हम सभी का मुंह सफेद पड़ गया। फिर खुलकर हंसे अपनी बेवकूफी पर। हर क्षेत्र में हर भाषा भाषी के लोग रहते हैं फिर हमने कैसे सोच लिया हमारी भाषा और किसी को नहीं आती??


कुछ घंटों का वह सफर काफी यादगार रहा।

What's Your Reaction?

like
3
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0