भुतहा हवेली -एक अन्धविश्वास

भुतहा हवेली -एक अन्धविश्वास

कहानी एक हवेली की जो गाँव से थोड़ी दूर पर थी लेकिन इतनी दूर भी नहीं कि खास कर वहाँ जाने पर ही दिखाई दे। अक्सर पास के बाजार में आते-जाते धुंधली सी दिख जाती थी। रात के अंधेरे में तो क्या दिन के उजालों में भी कोई उसके पास नहीं फटकता।

मेरा मन अक्सर हवेली की ओर खींचा चला जा रहा था, और एक दिन मन की जीत हुई और मैं पहुँच गई हवेली के नजदीक,हाँ  नजदीक ...... अभी अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। हवेली देख कर लगा नहीं बरसों पुरानी है। कोई ईटँ तो क्या टूटी दिखेंगी, एक दरार तक दिखाई नहीं दे रही थी। चमक तो ऐसी थी मानों अभी रंग-रोगन हुआ हो। अभी उसकी सुन्दरता निगाहों में उतार ही रही थी कि .......कुछ आवाज सी लगी ये आवाज मेरे अंदर से आ रही थी या हवेली से थोड़ा संशय  हुआ, सहसा कदमों की आहट सी लगी या फिर अनजाने डर से मेरी धड़कनें इतनी जोर से आवाज करने लगी थी। किसी तरह थोड़ी देर ठहर कर वापस लौटती हूँ ये सोच कर यहाँ दोबारा आना है, क्यूँकि अभी मेरी जिज्ञासा खत्म नहीं हुई थी। हवेली से जुड़ा रहस्य शायद मुझे बुला रहा था।

 हवेली की कहानियाँ यूँ तो बहुतों का डर आवाज बन कर मेरे कानों तक पहुँचा था। किसी ने बताया हवेली से एक साथ बहुत लोगों की हँसी की, गाने की, बुलाने की डरावनी आवाजें सुनाई देती है। एक दिलचस्प बात रात अंधेरे भूतों को देखा रंग-रोगन करते, इस बात पर तो मुझे भी यकीं हो चला था कि रंग-रोगन तो भूत जरूर करते है, आँखों से जो देख कर आ रही थी हवेली को। किसी को यकीन था भूतों को भूख भी लगती है, हवेली से जब हवा गुजरती है तो खुशबू आती है जैसे कोई पकवान पका हो। 

मुझे हवेली की अंदर की बातें तो सामान्य लगी जैसे कोई रहता हो और ये चीजें हो रही होती है, लेकिन बाहर में हवेली के नजदीक जाने मात्र से डरावनी आवाजें, शरीर में हल्के से बिजली के झटके महसूस होना या अचानक से साँसे रोक देने वाली आकृति का दिख जाना साथ ही खून के धब्बों का जगह-जगह होना। 

हवेली के अंदर जाने के लिए कोई दरवाजे का मौजूद नहीं होना पर खिड़कियों पर काले साये का दिखना। शायद इतना प्रयाप्त है किसी को ये विश्वास दिलाने के लिए कि वहाँ भूत-प्रेत का वास है। दरवाजे का ना होना ,ये स्थिति मुझे भी भयभीत करने लगी थी।
 

मेरी प्रवृत्ति या सरल शब्दों में मेरा स्वभाव रमता जोगी बहता पानी जैसा, यानि जब जहाँ मौका मिले दुनिया के किसी कोने में पहुँच कर उसको जानना समझना अच्छा लगता है, यहाँ से गुजरते हुए मुझे यहाँ की आबो-हवा में अपनापन महसूस हुआ और मेरे कदम यही रूक गए। मैं जहाँ जा रही थी उसी यात्रा का हिस्सा बन गया यह गाँव।
       

यहाँ के लोगों के लिए मैं नयी और वो सभी मेरे लिए अनजान लेकिन यहीं तो मेरा शौक है। मेरे बारे में कोई जाने या नही जाने पर मैं उस कस्बे, गाँव या फिर ऐतिहासिक स्थल से ढ़ेर सारी जानकारी और प्यार बटोर कर फिर कहीं और स्थान के लिए प्रस्थान कर देती हूँ। मेरा एक प्यारा सा परिवार भी है, जो हर वक्त मेरा हौसला बढ़ाता है। मैं जब भी उनके साथ अपनी यात्रा साझा करती हूँ तो अक्सर वो अचंभित होते हैं कितना कुछ छुपा के धरा अपने आँचल में बैठी है। इस बार यहाँ की घटना अभी तक उनसे सांझा नहीं की है मैनें।
                   

अब मुझे उस हवेली का राज किसी भी तरह जानना था। मेरी जिज्ञासा शायद जिद में बदल गई थी। अपनी आतुरता कम करने मैं शाम को बाहर निकल आयीं। बाहर आते-जाते बच्चों की टोली, बड़े-बूढ़ें, औरतें आपस में बातें करते हुए जा रही थी। जगह-जगह दो-चार उम्रदराज लोग इकट्ठा बैठ कर एक-दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। उनसे बात करने के लिए मैं भी वहाँ उनके बीच पहुँच गई। शुरुआत अभिवादन से कर मैंने पूछा-" काका कैसे है आप सब ?"
 

मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए बैठने का इशारा कर एक काका ने  कहा  -" बिटिया, सब लोग अच्छे हैं। इधर कैसे आना हुआ जरूर कुछ सवाल है तुमरे पास ",ऐसा बोल कर वो हँसने लगें। मैं झेंप गई, मुझे सब जानते थे वहाँ काफी दिन हो गए थे यहाँ रहते हुए ,इसलिए सब से परिचय हो गया था मेरा, बहुतों ने मेरा नाम " सवाली " रख दिया था क्यूँकि मैं अपने सवालों के साथ ही कहीं पहुँचती थी। मैंने हिम्मत कर काका से पूछा -" काका ,वो हवेलईईईई.....".मेरा सवाल पूरा होने से पहले ही सभी ने रोक दिया।  " बिटिया सब पूछो पर हवेली ना ना,,, उसके लिए कुछ नहीं। " एक तायाजी ने कहा।

मैं चुप हो गई और मायूस भी। कुछ देर उनकी बातों का हिस्सा बन वापस जाने को हुई, इस बात से अनजान कि वहाँ से कुछ दूर बैठे तायाजी सब कुछ देख और सुन रहे थे। मुझे वापस जाता देख उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा   -"कोई कुछ ना बोलेगा इनको कुछ पता ही कहां  है सिवाय इसके कि ये भुतहा हवेली है। आ बैठ मैं बताता हूँ क्या जानना है तुझे। "ऐसा कहते हुए उनकी आँखों में अनेक भाव उतर आयें और वो अतीत के गलियारों में कहीं खो से गए, ऐसा लगा जैसे किसी चल-चित्र की भाँति सब कुछ उनके सामने उभर कर आ गया हो।

"  ये हवेली बिटिया, इसके ठाठ-बाट, शान-ओ-शौकत के क्या कहने। आस-पास के इलाकों में ऐसी हवेली ना थी और उस पर से इमें रहन वाले देवता थे देवता। हवेली तो ऐसी बनाई थी तिलिस्म के जाने। न कोई दरवज्जा ओर अंदर जाय पर भुलभुलैया।"
 

दरवाजा नहीं है ये बात तायाजी जानते हैं,इसका मतलब हवेली के अंदर जाने का रास्ता है। मैंने अपनी जिज्ञासा छिपाते हुए उनसे पूछा -" दरवाजा नहीं होने पर लोग अंदर कैसे जाते थे।"

इसपे अपने बूढ़े चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोले -" यहीं तो राज है बिटिया ,जिससे सभी समझे कि इ हवेली मा भुत बसें हैं।" इतना बताने के बाद भी तायाजी ने हवेली में जाने का रास्ता नहीं बताया और फिर से कुछ याद करने की कोशिश में खो गए।शायद ये सोच रहें थे कि मुझे कहाँ से बताना शुरू करें, कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद उन्होंने बताना प्रारंभ किया और मुझे कई दशक पीछे ले गए।
 जब इस हवेली की अपनी पहचान और एक नाम भी था। "हरिकुटीर" नाम सुन कर दो बातें मन में तुरंत आई। एक तिलिस्म सी बनी हवेली और नाम ऐसा? दुसरे तायाजी ने बोला था इसमें रहने वाले देवता थे, जो कि हवेली का नाम सुन कर इस बात पर विश्वास हो चला था। हवेली की कहानी वहाँ निवास करने वाले राजेश्वर सिंह और उनकी पत्नी उमा देवी की शादी से शुरू हुई जो शाही शादी के लिए दशकों तक लोगों के दिल और दिमाग पर छायी रही। राजेश्वर जी ने धर्म और कर्म में समान रूप से सामंजस्य स्थापित कर रक्खा था। धर्म को अंधविश्वास की तरह नहीं मानते थे और ना ही कर्म किये बगैर किसी परिणाम की आशा रखते थे।

धर्म और कर्म दोनों को एक सिक्के के दो पहलू के जैसे देखते और आमजन को समझाने की कोशिश करते। राजेश्वर जी का नर्म स्वभाव और हरिकुटीर नाम से ऐसा प्रतीत होता जैसे वहाँ स्वंय हरि निवास करते हैं। राजेश्वर जी और उनकी पत्नी दोनों में अगाध प्रेम था। हवेली में हर वक्त जश्न सा माहौल रहता, खुशियों ने तो उनके घर पर अपना बसेरा बना लिया था। हँसी-खुशी से भरपूर दस साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। इन दस सालों में नौ प्यारी-प्यारी बेटियों के माता-पिता बन गए थे दोनों। जब पहली बेटी ने घर में दस्तक दी तो दोनों ने भरपूर प्रेम से उसका स्वागत किया, जश्न मनाया। ऐसा ही स्वागत राजेश्वर जी अपनी सभी बेटियों का किया।

किसी का भी कम नहीं और ना ही ज्यादा। बेटे की चाह में आयीं नौ बेटियाँ नव दुर्गा जैसी लगती। सारी बेटियाँ रूपवान थी। उन्हें एक साथ देख कर ऐसा लगता जैसे दुर्गा के सारे स्वरूप उनके घर में अवतरित हो गए है। उस जमाने में बेटे की चाहत हर किसी को होती। राजेश्वर जी को भी उनका वंश कैसे आगे बढ़ेगा, ये सोच लगी रहती लेकिन वो किसी को जताते नहीं थे। इन सब से परे उनहोंने बेटियों को बेटे से कम नहीं समझा। उमा जी अपनी बेटियों को उनकी उम्र के अनुसार गायन-वादन,नृत्य, घर के सभी काम आदि गुणों से परिपूर्ण कर रही थी। 

राजेश्वर जी का परिवार उन्हें और उनकी पत्नी को बेटा ना होने की वजह से कड़वी बात बोल देते थे।दबाव इस तरह बढ़ गया कि उनकी दूसरी शादी की चर्चा जोरों से होने लगी। ऐसी बात जब उन तक पहुँची तो राजेश्वर जी ने सख्ती से दुसरी शादी के लिए मना कर दिया। उमा जी, जो ऐसी बातों से विचलित रहती थी अब उनको भी चैन की साँस आयीं हालांकि वो भी चाहती थी उनको भी एक बेटा हो पर इस तरह दूसरा विवाह हो, ये बिलकुल भी नहीं। 

राजेश्वर जी ने अपने मन से बेटे की चाहत निकाल दी और अपनी पत्नी को भी समझदारी से समझाते और कहते -"भगवान ने जरूर कुछ अच्छा सोचा होगा हमारे लिए तुम बिलकुल भी चिंता नहीं करों। "इन सब बातों के बीच पंद्रह साल निकल गए और उनकी सबसे बड़ी बेटी चौदह साल की और सबसे छोटी चार साल की हो गई। लेकिन कहते हैं ना समय का पहिया कब और किधर मुड़ जाये पता नहीं चलता। सब कुछ अच्छा रह नहीं पाता, ऐसी ही कुछ दर्दनाक घटना उनके साथ घटित हो गई जिसमें सब कुछ तबाह हो गया।

राजेश्वर जी की यश कीर्ति चारों ओर फैली थी लेकिन उनके धनी होने की चर्चा उन पर भारी पड़ गई। एक दिन डकैतों ने उनकी हवेली पर हमला कर दिया। हरिकुटीर के अंदर जाना आसान नहीं था,क्युँकि अंदर जाने का रास्ता कुछ विश्वासपात्र लोगों को ही पता था जिनमें से बाहर बैठा चौकीदार भी शामिल था। 

चौकीदार रमेश ने बहुत बहादुरी दिखाई डकैतों को अंदर जाने से रोकने के लिए। अंत में लड़ते-लड़ते उसके प्राण निकल गये, उसका मृत शरीर डाकू ने पकड़ रखा था। बाहर इतना शोर सुन कर राजेश्वर जी ने झरोखें से देखा और गलतफहमी की वजह से उन्होंने दरवाजा अंदर से खोल दिया। उनको लगा रमेश की गरदन पर डाकू ने चाकू रखा है, पर रमेश तो तब तक मर चुका था। दरवाजा खुलते ही सारे डाकू ने अंदर प्रवेश कर इंसानियत की धज्जियां उड़ा दी। राजेश्वर जी ने बहुत कोशिश की और बहुत बहादुरी से डाकुओं से लड़े पर वो और उनके आदमी बहुत देर तक डाकुओं के सामने टिक नहीं पायें। डाकुओं ने सब कुछ लुटते हुए वहाँ नरसंहार मचा दिया। सारे परिवार वालों को मार दिया। बच्चों की भी हत्या करते उनके हाथ नहीं काँपे। जो भी दिखा सब मारते चलें गए, खून की धारा बहनें लगीं।
        
राजेश्वर जी को जीवित छोड़ वो सब चलें गए। राजेश्वर जी कुछ देर विक्षिप्तों की भाँति इधर-उधर भागते रहे और अंत में उन्होंने खुदखुशी कर ली। हरिकुटीर में उस दिन एक भी प्राणी जीवित नहीं बचा। अगले दिन पुलिस और प्रशासन की मदद से मृतकों का दाह-संस्कार किया गया और हवेली की सफाई करवा दी गई। उस दिन से वहाँ कोई नहीं जाता। हवेली का दरवाजा खुला था पर अचानक एक दिन खुद-ब-खुद बंद हो गया।

हवेली से आने वाली आवाजें और खुशबू से ऐसा लगता है कि उनकी बेटियों की असमय मृत्यु के कारण उनकी भटकती आत्मा वहाँ निवास करने लगी है।सारी बातें पता चलने के बाद मैंने तायाजी से पुछा -" तायाजी हवेली का दरवाजा कैसे खुलता है, आपको कैसे पता दरवाजा खुलने का रहस्य? "
   

इसपर तायाजी हल्के सी मुस्कान के साथ बोलें -" बिटिया मेरी उम्र और मेरी जानकारी से लगता नहीं मैं उस घटना से जुड़ा हूँ। मैं उसी चौकीदार रमेश का पोता हूँ। जब यह घटना घटी तब मेरे पिताजी भी छोटे थे पर दादाजी ने उन्हें दरवाजा खोलने का तरीका बता रखा था क्यूँकि दादाजी जब बीमार होते तब उनकी जगह मेरे पिताजी चौकीदारी करते थे।  पर तुम क्यूँ पुछ रही हो....ना बिटिया उधर मत जाना।"
 

" ठीक है तायाजी मैं उधर नहीं जाऊँगी पर मुझे दरवाजा कैसे खुलेगा ये तो बता दीजिए। "मेरे बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने बताया -"बिटिया वहाँ लाल रंग के धब्बें जमीन पर दिखाई देंगे पर असल में वो पत्थर हैं, कुछ दूर तक उन पत्थरों से सजाया गया है। मैंने भी उन धब्बों को देखा था। रात में वह खून के धब्बें लगते हैं और दिन में सूर्य की किरणों में पत्थर। पहले और दूसरे पत्थर पर खड़े होने पर ठीक पीछे की दीवार पर लोहे की कीलनुमा छोटा सा समान उभरता है जिसे दबाने से दरवाजा खुल जाता है।"

मैंने पुछा-" ये सब करते हुए इतने सालों में किसी ने नहीं देखा?"इसपर तायाजी बोले -" पत्थरों को इस तरह रखा गया था कि किसी के आने पर मेरे दादाजी खड़े होते तो सामने वाले को लगता कि वो उनके सम्मान में खड़े है, जब आने वाला आदमी दरवाजे पर दस्तक देता तब दादाजी उस कील को दबा देते थे। जिसका रहस्य वहाँ आने-जाने वाले को कभी नहीं चला। "मैं तायाजी का ह्रदय से धन्यवाद कर वहाँ से चली आई।

वापस आकर मेरा शक यकीन में बदल गया। हवेली में कुछ गड़बड़ है जिसका मुझे पता लगाना है। थकान के कारण मुझे नींद आ रही थी, कल से अपने अभियान पर काम करूँगी ऐसा सोच कर मैं सोने चली गई। अगली सुबह मैंनें हवेली के अंदर ना जाने का फैसला करते हुए पहले हवेली की रेकी करना उचित समझा।

रेकी के दो दिन के दौरान हवेली के अंदर अक्सर रात के अंधेरे में कई लोगों को देखा। दिन में यदा-कदा ही बाहर निकलते हुए किसी को देखा मैंने। इसलिए अब रात में ही मुझे यहाँ रह कर देखना होगा, अपने डर को काबू में करके मैं रात में आ गई और मुझे सफलता भी मिली। इन पाँच दिनों में एक बार एक आदमी के आँखों पर पट्टी बांध कर ले जाते हुए भी देखा, अगले दिन काफी मात्रा में सामानों को ढ़ोते हुए बहुत सारे लोग दिखें। जिसे देख कर खतरनाक हथियारों का अंदेशा हुआ मुझे। ये सारी गतिविधियों से साफ हो गया था कि यहाँ गैरकानूनी काम हो रहा है जो बहुत ही जल्द किसी खतरनाक घटना को अंजाम देने की तैयारी में लगें है। चार-पाँच दिनो की दिन-रात की मेहनत मेरी रंग लाई। अब ऐसी स्थिति में अकेले अंदर जाना मूर्खता थी सो मैंने स्थानिय पुलिस और प्रशासन को सूचित किया। उन्हें विश्वास दिलाना थोड़े प्रयास के बाद पूरा हुआ। लेकिन मैंने उनको कहा -"पहले आप भी रेकी कर सारी गतिविधियों से अवगत हो जायें जिससे आपको उन लोगों को पकड़ने में आसानी होगी।"

मेरी बात उनको सही लगी और उन्होंने भी रेकी की। उनकी रेकी अधिक सावधानी और योजना के साथ होने से उनके हाथ अहम् सबूत लगें।जिसमें उनकी  योजना के अनुसार आसपास के बहुत सारे इलाकों में लूटपाट मचा कर पुलिस और प्रशासन का ध्यान हटा कर बड़े शहर में आतंकवादियों की सहायता से एक बड़ी घटना को अंजाम देना शामिल था।

सारी जानकारी से अवगत होने के बाद पुलिस ने सशक्त योजना के तहत अपने पूरे दल-बल के साथ वहाँ धावा कर दिया। जहाँ उन्हें कुख्यात अपराधी मिला जिसकी संलग्नता आंतकवादियों से थी, गिरफ्तार किया। हवेली ने पुनः खून की होली खेली, पर इस बार अपराधी थे सभी इसलिए किसी को तकलीफ नहीं हुई। हवेली को सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया, शायद सरकार कुछ अच्छे काम के लिए इस्तेमाल करेंगी। इस पूरे प्रकरण में सरकार ने मेरा नाम गुप्त रखा और गाँव वालों को भी कुछ पता नहीं चला। मैं हवेली के रहस्य को जानकर खुश थी साथ ही अपराधियों के पकड़े जाने से भी।हवेली वापस हरिकुटीर हो गई थी ये मेरे लिए बहुत ही सुखद अनुभूति थी। 
   

गाँव वालों को भी यकीन हो गया कि भुत-प्रेतात्माएँ नहीं होती। सजग रहने की जरूरत है और अब कोई भी ऐसी बात होने पर तुरंत पुलिस को सूचित करेंगे। मैंने भी अब यहाँ के लोगों से विदा ली, और अपने सफर पर निकल गई। 

अब आपसे भी अलविदा इस सोच के साथ आपसे फिर मुलाकात होगी अपने नये सफर से रूबरू करने के लिए।

 Niitu khetan

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