बेमिसाल व्यक्तित्व के धनी गुरुदत्त - Bollywood Updates

बेमिसाल व्यक्तित्व के धनी गुरुदत्त - Bollywood Updates

कलात्मक फ़िल्मों के रचयिता, श्रेष्ठ अभिनेता और बेमिसाल निर्देशक गुरुदत्त हिन्दी सिनेमा के इतिहास का एक जानदार किरदार थे।


गुरुदत्त का नाम आते ही उनकी बेमिसाल फिल्मों के नाम लोगों के जुबां पर अक्सर आ जाते हैं। क्राइम थ्रिलर फिल्में बनाने में उनका कोई जवाब नहीं था और जाल एवं बाजी जैसी फिल्में इस बात का बेनमून उदाहरण है। गुरुदत्त एक ऐसे ठहरे हुए इंसान और सुलझे हुए फिल्मकार थे, जो कामयाबी पर इतराते नहीं थे और नाकामी से घबराते नहीं थे।

बॉलिवुड में अगर पहले शो-मैन का खिताब किसी को जाता है तो वह हैं गुरुदत्त। गुरुदत्त एक कॉमर्शियल मूवी को एक आर्ट मूवी की तरह पेश करते थे।


गुरुदत्त का जन्म नौ जुलाई, 1925 को कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले में हुआ। उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशकर पादुकोण था। बचपन में आर्थिक दिक्कतों और पारिवारिक परेशानियों के कारण गुरुदत्त की ज़िंदगी मुश्किल रही। शुरुआत में उन्होंने कोलकाता में एक टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की, अपने चाचा की मदद से उन्होंने पुणे स्थित प्रभात फिल्म कंपनी में तीन साल के लिए नौकरी हासिल की। यहीं से वह कुछ फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आए। उनकी देव आनंद से पहली मुलाकात यहीं हुई। बाद में वह फिर मुंबई लौटे और फिल्म निर्माण एवं अभिनय की शुरुआत की। उन्होंने बतौर निर्देशक पहली फिल्म वर्ष 1951 में बाजी बनाई।


गुरुदत्त ने प्यासा, कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम और चौदहवीं का चाद जैसी कई यादगार फिल्मों का निर्माण किया। इसी दौरान अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ उनकी जोड़ी काफी चर्चित रही। पर्दे के पीछे इन दोनों के रूमानी रिश्ते की भी चर्चा रही।


कहा जाता है कि जिस रात गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे उस रात उन्होंने जमकर शराब पी थी, इतनी उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी. गीता दत्त उनकी पत्‍‌नी, जिनके साथ वह उनके अलगाव का दौर था। उस रात गीता के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी। गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था। गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी। हर फोन के साथ गुरुदत्त का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। अंत में उन्होंने अल्टीमेट देते हुए कहा, “बच्ची को भेज दो या फिर तुम मेरा मरा मुंह देखो.” इसके बाद उन्होंने करीब एक बजे खाना खाया और ऐसे सोए कि दुबारा नहीं उठे। उनकी मौत उनके कमरे में हुई।


10 अक्तूबर, 1964 को उनका निधन हुआ, उस समय उनकी उम्र महज 39 साल थी। उनकी मौत को लेकर रहस्य है। कुछ लोग इसे खुदकुशी कहता थे। उनकी आखिरी फिल्म सांझ और सवेरा थी। टाइम पत्रिका ने प्यासा और कागज के फूल को 100 सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शामिल किया। सीएनएन ने गुरुदत्त को एशिया के 25 सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में शामिल किया। आज भी गुरुदत्त की फ़िल्में और उनके गानों को लोग खूब याद करते है।

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