चूल्हा माटी का

चूल्हा माटी का

बहुत अजीज है मुझे वो कोना मेरी छत का,

जहां बना है एक चूल्हा माटी का। 

और अजीज है हफ्ते का वह दिन भी दोस्तों, 

जब चूल्हे पर अपने हाथों से फुलके सेंक, 

प्यार से मां बन खिलाती है मेरी सासू मां।

कभी गेहूं, कभी मक्के,

तो कभी बाजरे की रोटी, 

और भी बढ़ जाता है स्वाद

जब संग साग के होती। 

जाड़ों की सर्द रातों में घेर चूल्हे को, 

बैठ जाते हैं हम सब आंच तापने को।

और वह मां फुलकों के साथ,

परोसती है हम बहुओं को,

अपनी ममता का भी स्वाद।

खुद ब खुद याद आ जाता है,

वो प्यारा सा बीता हुआ बचपन,

जब चूल्हे पर हाथ तापते थे,

मिलकर हम सब भाई-बहन।

यह कोना ससुराल का होकर भी,

ससुराल का नहीं लगता,

शायद, जो न होता गर यह कोना,

तो यहां कोई मुझे अपना सा न लगता। 

थोड़ी सी देर को फुर्सत पा जाती हूं, 

ससुराल की जिम्मेदारियों से, 

और एहसास मायके का कर लेती हूं। 

सास का एक रूप यह भी देख कर, 

खुद को भाग्यशाली समझ लेती हूं।

#weekendpoetrychallenge


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