चातुर्मास का महत्व - Indian Culture and Festivals

चातुर्मास का महत्व - Indian Culture and Festivals

"चातुर्मास में भगवान विष्णु की भक्ति करें और मोक्ष पाएं"


सनातन धर्म में चातुर्मास के चार महीनों को धर्म और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। देवशयनी एकादशी से लेकर देव उठनी एकादशी के बीच मंदिरों में भगवान विष्णु को पीले वस्त्रों का शृंगार करके सफ़ेद वस्त्र ढ़ककर क्षीर सागर शैया पर शयन कराते है। व्रत और त्योहारों से भरे चातुर्मास में लोग भक्ति भाव और जप-तप द्वारा अपना अंत काल सुधारने हेतु ईश्वर की शरण में रहकर ध्यान धरते है।


पद्मपुराण के अनुसार जो मनुष्य चातुर्मास के दरमियान मंदिर में झाडू लगाकर, धोकर साफ़ करते है या मंदिर की कच्ची जगह को गोबर से लीपते है उन्हें सात जन्मों तक ब्राह्मण योनि मिलती है। धूप दीप नैवेद्य और पुष्प से पूजन करने वाला भक्त अक्षय सुख प्राप्त करता है।


इन दिनों माता लक्ष्मी और पार्वती को प्रसन्न करने के लिए चाँदी के पात्र में हल्दी भरकर दान करते है, और माना जाता है फलों का दान नंदनवन का सुख देता है। चातुर्मास्य का महत्व पुराणों में बखूबी गाया गया है। आँवले के जल से स्नान करके मौन रहकर भोजन करना अति श्रेय कर माना गया है।


इन चीज़ों को महज़ धार्मिक द्रष्टि से नहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चातुर्मास यानि बारिश का मौसम। और इस मौसम में असंख्य जीव जीवाणु पनपते है। खानपान और व्रत उपवास से तंदुरुस्त रहकर बिमारियों से बचाव किया जा सकता है।


कहा जाता है कि चातुर्मास में एक समय भोजन करना चाहिए। भू‍खे को अवश्य भोजन कराना चाहिए। भगवान के शयन के बाद भूमि पर शयन करना चाहिए और मैथुन से दूर रहना चाहिए। स्वस्थ और निरोगी रहने के लिए श्रावण में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग करना चाहिए। चातुर्मास समाप्ति पर यथायोग्य भगवान का पूजन करके दान देना चाहिए। ध्यान देने योग्य बात यह ‍है कि दान सुपात्र को ही दिया जाना चाहिए। कुपात्र को दान देने से कोई फल नहीं मिलता।


चातुर्मास में महापर्व संवत्सरी भी आता है। इस दृष्टि से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह जैनों का अलौकिक पर्व है। जैन धर्म में चातुर्मास की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। स्वयं श्रमण भगवान महावीर ने अपने जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास किए। उन्होंने अपना अंतिम 42वां चातुर्मास पावापुरी में किया था। यहां उन्होंने अपना अंतिम उपदेश तथा देशनाएं दी थीं जो जैनों के प्रसिद्ध आगम ‘उत्तराहयमन सूत्र’ में संकलित हैं। अपने इस अंतिम चातुर्मास में भगवान महावीर ने अपने प्रधान शिष्य गौतम स्वामी को प्रतिबोध देते हुए कहा था-‘समयं गोयम मा पमाए’ अर्थात ‘‘हे गौतम! संयम साधना के लिए एक क्षण भी आलस्य मत करो।’’


जन्माष्टमी, रक्षा बंधन और संवत्सरी जैसे त्योहारों से सजे चातुर्मास में भगवान विष्णु की भक्ति से जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकते है।


(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0