चुप्पी

चुप्पी

अभी रात शुरू ही हुए थी। लतिका बिस्तर पर बैठी कुछ लिखने के ऊहा-पोह में थी। दिन के शोर-शराबे के बाद रात के एकाकीपन में खायालों से खुल कर बतियाने और उन्हें लिख डालने का शगल ही कुछ और है। लगभग साढ़े ग्यारह बजे होंगे घर के दीवार से लगे पड़ोसी के फ्लैट से कभी-तेज़-कभी-धीमी आवाजें आने लगी। उसकी तल्लीनता लेखन से भटक कर उस आवाज़ पर केंद्रित हुई, लगा कोई रो और गिरागिरा रहा है। थोड़ी देर बाद किसी में मारने-पीटने की भी आवाज आई। कुछ देर बाद शांति। लतिका को लगा कोई भ्रम होगा।

थोड़ी देर में उसकी आँख लगने लगी, लेकिन कुछ एक आधे घंटे के बाद फिर वही आवाज़। वह घबरा कर उठ गई, लेकिन पुनः शांति। अब उससे रहा नहीं गया और उसने परोसन सहेली को मैसेज किया "सब ठीक है!" देर तक कुछ जवाब नहीं आया और वह इंतजार में जागती रही। लगभग आधे घंटे बाद जवाब आया "ऑल ओके"। लेकिन उसके पंद्रह-बीस मिनट बाद फिर मार-पीट शुरू। रात के तीन बजे तक सिलसिला चलता रहा। अंततः हिम्मत करके लतिका घर से निकली और उनके घर की घंटी बजाई। मिनट भर तक वह रह-रह कर घंटी बजती रही। आखिर घर का पुरुष सदस्य बाहर निकाला।

"आप इतनी रात को? सब ठीक है ना!"

"हाँ सब ठीक है.... मीना को बुला देंगे? उससे कुछ...."

"इतनी रात को मीना से क्या काम है? वो सो रही है।" उसने  तल्ख़ी से कहा।

लतिका के पति शहर से बाहर गए थे, घर में बच्ची अकेली सोई थी, घबराहट में उसके माथे पर पसीने की बूंदें आ गई..... "वो लेडी प्रोबलम है....मीना को बुला दीजिए ना।" कहते हुए लतिका उसे धकेलती हुई कमरे में चली गई।

"मीना...मीना....!!"

"ये क्या बदतमीजी है? ऐसे कोई आधी रात....." वह बात पूरी करता कि लतिका भागती हुई कमरे में दाखिल हुई। मीना अपने बच्चों को सीने से लगाए कोने में दुबकी सिसक रही थी। बाल उजड़े थे, आँखों के नीचे कुछ नीले धब्बे। अब "ऑल ओके" का मतलब जानने केलिए किसी शब्द की जरूरत न थी।

पीछे से मीना का पति भी दाख़िल हुआ वह कुछ कहता कि लतिका ने मोबाइल आगे किया "पति को फोन लगाया हुआ है, वह सब सुन रहे हैं। कोई भी होशियारी की तो सीधा जेल।"

"मीना इतनी पढ़ी-लिखी हो सबको सही-गलत समझाती हो और खुद इस अन्याय पर खामोश हो! ये कैसी चुप्पी है? अपने बच्चों को क्या संदेश दे रही हो?" मीना का चेहरा उसके बेसाहरेपन की पोल खोल रहा था। लतिका ने हिम्मत से कहा "डरो मत यार मेरा हाथ पकड़ो! अकेली नहीं हो तुम मैं तुम्हारे साथ हूँ.....हमेशा!"

मीना लतिका से लिपट कर फफक पड़ी "अब नहीं....अब नहीं...अब ये चुप्पी और नहीं! चुप रहो, चुप रहो सुन-सुन कर मैं गूँगी ही हो गई थी। अब सबको मेरी आवाज़ सुननी होगी। तुमने हाथ बढ़कर मेरे मरते स्वाभिमान में जान फूंक दी है। मुझे बचाने केलिए तुमने दीवार लाँघ दी तो अब मैं भी इस चुप्पी को तोड़ कर रहूँगी। "

✍ रागिनी प्रीत

What's Your Reaction?

like
4
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
1