चुप्पी तोड़ पिंजरे से उड़ जाना है

चुप्पी तोड़ पिंजरे से उड़ जाना है

आजादी किस को अच्छी नही लगती।हर इंसान खुले आसमान में पंख लगा के उड़ाना चाहता है। सपने देखने का हक सबको है। अपने तरीके से जीवन जीने का हक सबको है। फिर ये भेदभाव क्यो..... लड़को के सपनो की अहमियत होती है,तो बेटियों की क्यो नही।

"सपने देखने और उसे पूरा करने का हक सबको है।"सुलेखा ने अपनी बेटी नैना को कहा।

"पर आपको पता है ना हमारे घर में बेटीयों को ना सपने देखने का हक है और ‌उसे पुरा करने का अधिकार।"नैना अपनी मां को कहती हैं।

सुलेखा "नैना मेरे साथ जो भेदभाव हुआ है। वो मैं तेरे साथ कभी नही होने दुगी। मेरे सपनों को पुरा करने में, मेरे साथ कोई खड़ा नही था।पर तेरे सपनों को पुरा ‌‌करने के लिए तेरी मां हमेशा तेरे साथ खड़ी रहेगी।

नैना बहुत अच्छा गाना गाती है। उस की आवाज में सरस्वती बसी है। इतनी मिठी और मनमोहक आवाज है कि जो एक बार सुन ले तो वो बार-बार उस आवाज को सुना चाहेगा। सुलेखा भी बहुत अच्छा गाती थी,पर उसके परिवार वालो ने कभी उसकी सपनों की अहमियत नही समझी।उनका मानना था कि लड़कियों को शादी, बच्चे और घर सभलाने के अलावा कुछ नही करना चाहिए।उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं। उन्हें अपनी बात रखने का तक कोई अधिकार नही।लड़को  को सब अधिकार है, पर लड़कीयों का अपना कोई अधिकार नही।

सुलेखा को लगा कि शादी के बाद शायद उसके ससुराल का माहौल उसके मयाका जैसा नही होगा,पर वो ग़लत थी... ।कुछ भी अंतर नहीं था ।वहीं भेदभाव वाली सोच रखने वाले लोग। सुलेखा के पति अमरचंद की सोच भी वैसी ही थी। नैना सुलेखा की पहली संतान थी। जिसके पैदा होने पर सब दुखी हुए थे।पर सुलेखा ने उसे अपने सिने से लगा कर रखा। उसने उसी वक्त मन ही मन तय कर लिया था कि..वो अपनी बेटी के सब सपनों को पूरा करेगी, उसे अपने तरीके से जीने देगी। उसे खुले आसमान में उड़ने देगी। उसका साथ कभी नही छोड़ेगी। नैना के जन्म के चार साल बाद सुलेखा ने  एक बेटे को जन्म दिया। तब अमरचंद ने पुरे मुहल्ले में मिठाई बांट थे।लड़के का पिता बने थे उनके लिए आज वो सही मायने में आज पिता बने है।

अमरचंद ने कभी भी नैना से प्यार से बात नही।पर सुलेखा ने हर पल उसे प्यार दिया। एक बार नैना अपने स्कूल के फंक्शन में गाना गाती है ।जो सबको बहुत अच्छी लगती हैं। सब उसकी तारीफ भी करते हैं।,वो घर आ कर अपनी मां को  बोलती है। मां मैं संगीत सीखना चाहती हुं। मैं बड़ी होकर गायिका बनूंगी। सुलेखा जी नैना से कहती हैं "इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी। बहुत अभ्यास भी करना होता है।"तब नैना कहती हैं "मां आप मेरी गुरू बन जाइए,आप भी कितना अच्छा गाती है।मां से बड़ा कोई गुरु होता है क्या??

सुलेखा ने नैना को संगीत सीखना शुरू किया।पर जब घर पर कोई नही होता तब दोनो मिलकर अभ्यास करती। एक दिन नैना स्कूल‌ से आते ही सुलेखा को एक बहुत अच्छी  खबर देती  है।वो कहती है"मां मेरा चयन हो गया है एक संगीत प्रतियोगिता में। अगर मैंने इसमें अच्छा प्रर्दशन किया तो मुझे अपने सपनों को पुरा करने से कोई रोक नहीं सकता।".......... मां आपको पापा से बात करनी होगी।

सुलेखा अमरचंद से  इस बारे में बात करती है तो अमरचंद साफ मना कर देते हैं और दोनो पर बहुत गुस्सा करते है। तब पहली ‌बार सुलेखा भी अपनी बात पर अड जाती है और अपने पति को कहती हैं"क्या बेटीयों को सपने देखने का हक नही । उन्हें भी अपनी पहचान बनाने का हक है। बहुत हो गया.....आप का।कब तक चुप रहेंगे।आज से चुपी खत्म।मैं अपनी बेटी के सपनो को मरने नही दुंगी।वो उड़ेगी, और वो भी अपने सपनों के साथ। अपनी ‌ एक नयी पहचान के साथ।मैं साथ दुंगी अपनी बेटी का चाहे इसके लिए आपसे बगावत ही क्यों ना करनी पड़े।"अमरचंद हका बंका रह जाता है सुलेखा की बातो को सुन कर.....। जिनसे आज तक कभी उससे ऊंची आवाज में बात नही की है।आज वो बगावत पर आ गई है।

पर कहते हैं जब एक मां अपने पर आ जाती है ।वो कुछ भी कर सकती है।भले वो अपने हक के लिए कभी ना लडे।पर अपने बच्चों के लिए सब से लड़ जाती।जब तक आप की मां  का आशीर्वाद आप के साथ है आप अपने हर सपने को पूरा कर सकते है।

बात सिर्फ नैना और सुलेखा की नही।बात उन सब औरतों के लिए जिनके परिवार वाले उनके सपनों की अहमियत नही समझते।उन लोगो को लगता है कि लड़कियों की अपनी पहचान बनाने का हक नही है। आज भी आजाद  हिन्दुस्तान में बहुत ही कम लोग बेटीयों के सपनों की अहमियत समझते हैं????

बस एक सवाल आज भी और भविष्य में भी रहेगा "बेटीयों की कद्र करो, उनके सपनों को अहमियत दो, उन्हें भी खुले आसमान में उड़ने का हक दो??????

अब चुप्पी  तोड़ उड़ जाने का समय आ गया है।

#ये कैसी चुप्पी 

धन्यवाद

सीमा कृष्णा सिंह

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