देव दिवाली कार्तिक पूर्णिमा

देव दिवाली कार्तिक पूर्णिमा

कार्तिक पूर्णिमा, देव दिवाली, या कार्तिक माह का समापन दिवस कह सकते हैं। कार्तिक माह की अमावस्या से प्रारंभ हुआ रोशनी का यह महा पर्व  अंतर्मन में, निराशा के अंधेरे को आशा और विश्वास के उजाले से रोशन करने की एक प्रथा, एक परंपरा  है।

कार्तिक की अमावस्या तिथि की काली रात से एक छोटे से दीपक के प्रकाश से घोर अंधेरे को चीरता हुआ अंतर्मन की सकारात्मकता  की ऊर्जा का संचार करता हुआ यह प्रकाश पर्व आज सिर्फ देव दिवाली ही नहीं बल्कि मनुष्य के पुनर्जागरण का भी प्रतीक है। चंद्रमा स्वयं आत्मा का स्वरूप है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य के अंदर देवी शक्तियां विराजमान है, लेकिन निराशा और नकारात्मकता के कारण यह निष्क्रिय होने लगती है।

मान्यता है की अमावस्या की घोर अंधेरी रात में दीपक जलाकर उनका नाश किया जाता है और देवों के साथ-साथ अपने अंतर्मन में विराजमान शक्तियों को जागृत किया जाता है। इस कोरोना काल में तो और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है यह दिन क्योंकि इन विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए हमें अत्यंत सकारात्मक होकर सक्रिय होना होगा क्योंकि यह सिर्फ एक प्राणी मात्र की नहीं अपितु पूरे संसार की विपत्ति का क्षण है अतः हमें अपने अंतर्मन में आत्मा रूपी चंद्रमा को समर्पित सकारात्मकता की लहरों में एक पुनर्जागरण का दीप प्रज्वलित करना ही होगा।

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