धुंधली सी एक परछाई !

धुंधली सी एक परछाई !

ये रविवार सिया को देखने कुछ लोग आने वाले हैं , अपने रणविजय साहब हैं न ग्वालियर वाले उनका कोई दूर का भांजा लगता है।  अख़बार के पन्ने पलटते हुए राघव ने अपनी पत्नी आरती से कहा। ग्वालियर का नाम सुनते ही आरती के हाथ में थमा पानी का ग्लास छूट कर ज़मीन पर जा गिरा। क्या कहा आपने ग्वालियर ? हाँ वहां खुद का घर है उन लोगों का , लड़का किसी आईटी कंपनी  में जॉब करता है और हाँ लड़के की माँ कुछ साल पहले दुनिया छोड़ गयीं ।  तो क्या नाम बताया आपने ? आरती ने लड़खड़ाती जुबां से पूछा। नाम वैगरह ज़्यादा जानकारी तो मुझे नहीं है , बस शाम को ऐसे ही चाय पर बुला लिया है।  देखते हैं अगर बात बनी तो।

कहकर राघव अख़बार  मशरूफ हो गए। मैं अकेले बड़बडाती हुई ” (अरे ग्वालियर तो कितना बड़ा है , मैं भी क्या क्या सोच लेती हूँ )अपने काम में लग गयी। राघव नाश्ता करके दफ्तर निकल गए और मुझे दे गए एक मुश्किल काम ” सिया को ज़रा बताकर रखना आरती, रविवार के बारे में। हाँ वो ऑफिस से लौटेगी तो बता दूगी उसे , कहते हुए मैंने सर हिला दिया। वापस रसोई में लौटने से पहले रेडियो ऑन किया और लगी घर समेटने। सब काम खत्म कर मैं बालकनी में कुर्सी डालकर पौधों के पास  जाकर बैठ गयी। हाथ से फूलों को छूकर कुछ गुनगुनाने की शुरुआत की तो फ़ोन के मैसेज की धुन ने मेरा ध्यान खींचा , राघव का मैसेज था ” आकाश शर्मा है लड़के का नाम , पिता का नाम विशाल शर्मा ” तुम पूछ रहीं थी न।

विशाल शर्मा , विशाल ….  नाम लेते हुए मेरी आँखों से ना जाने क्यों आंसुओं की झड़ी सी बह निकली। दौड़कर अपने कमरे में रखे वो पुराने बक्से को आज खोलकर ,अपनी पुरानी डायरी को तक़रीबन 25 साल बाद अपने सीने से लगा लिया। कितनी कोशिश की थी इसे जला दूँ , पर नहीं कर पायी।  खोलकर आज हर पन्ने पर लिखे विशाल और आरती को छूकर बस यही सोचे जा रही थी ” अब क्यों , इतने सालों बाद क्यों , तुम घर आओगे , अब क्यूँ। कुछ घंटे मैं यूँही अपने शब्दों में उलझी रही ,खुद से सवाल करती रही। आज बीता हुआ कल मेरे सामने आ खड़ा हुआ था , सब तो अच्छा था हमारे बीच, बस हालात ठीक नहीं थे। तुम्हे अंकल आंटी ने गोद लिया था , उनका खुद का खून नहीं थे तुम। तो क्या ….. ?

सोचते सोचते आंसू फिर बह निकले।  दरवाज़े पर आहट हुई और माँ माँ कहाँ हो आप , की आवाज़ ने मुझे आज में लाकर फिर खड़ा कर दिया। किताबों के बीच अपनी डायरी को छुपाते हुए मैंने सिया की ओर अनजान बन देखा और पूछा ; और दिन कैसा रहा सिया ? चाय पीयेगी। अपना फ़ोन टेबल पर रखते हुए वो बोली ” माँ आप रो रही थीं न , ओफ्फो क्या हुआ। कहते ना जब बेटियाँ बड़ी हो जाती है वो आपकी खामोशी पढ़ना भी सीख लेती है।  सिया के सामने मुझे उदास होने का कोई हक़ नहीं था , बहुत बैचैन हो जाया करती है , बस मेरी शक्ल को देखती रहती है , जब तक मुस्करा न दूँ मेरे आगे पीछे घूमती रहती है। और मेरी शुरू की आदत रही अगर कोई पूछ ले की क्यों रो रही थी तब तो और फूट फूट कर रोना आ जाता है।पर आज जैसे तैसे खुद को सभांल , मैंने बात पलट दी।  हाँ वो टीवी सीरियल में बिदाई का सीन देख कर आँखे नम हो गयी बेटा। मुझे गले लगाकर वो खूब हंसी और मुझे कहती रही “इतनी जल्दी आप मुझसे पीछा नहीं छुड़ा सकती माँ ,कही नहीं जा रही हूँ मैं।  आज मैं उसको गले लगाकर खूब रोना चाहती थी।

सुन सिया ये रविवार कुछ मेहमान आने वाले  हैं , मैंने हौसला बांधते हुए कहा। मेहमान ? हाँ मेहमान, किसी से मिलवाना है तुझे।  सुनकर सिया का चेहरा लाल हो  गया था , माँ क्या है ये सब, २ साल कोई शादी वादी नहीं करनी मुझे , कितनी बार आप दोनों को समझाऊं मैं ! देखते देखते भी तो समय लगता है सिया , ज़रूरी  तो नहीं आकाश तुझे पसंद आ ही जाए।  ओह्ह तो आकाश नाम है ,अपनी त्योरियां चढ़ाते हुए बोली।  ठीक है आने दो उसे , मैं मना कर दूंगी जैसे हर बार करती हूँ ; कहकर वो अपने फ़ोन में व्यस्त गयी।

बीच के ये दो दिन जैसे पलक झपकते बीत गए और रविवार का दिन आया।हल्के गुलाबी रंग की बॉर्डर वाली प्लेन साड़ी पहनी थी मैंने , बस हाथ में  दो कंगन और माथे पर नन्ही लाल बिंदी। सिया ने बिल्कुल  सजने सवरने से इंकार कर दिया था  , बस सादा सा सूट सलवार पहन कर तैयार हुई थी। उसे ज़रूरत ही कहाँ थी सजने की , ऐसे ही कितनी प्यारी लगती है। मैंने उसके कान के पीछे चुपके से काला टीका लगा दिया।

उन लोगो के आने में अभी वक़्त था , मैं अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आँखे बंद कर लेट गयी। विशाल हमारे सामने वाले घर में रहते थे , हमारा बचपन साथ बीता , साथ खेलते , खाते , झगड़ते और पढाई भी साथ साथ। हम दोनों के माता की भी काफी अच्छी दोस्ती थी। जैसे जैसे बड़े हुए ,पता नहीं कब हमारी दोस्ती एक सच्ची मोहब्बत में बदल गयी। विशाल की मम्मी ने तो जैसे मुझे अपनी बेटी ही मान लिया था।  वो पढ़ सकती थी हम दोनों की आँखों में एक दूसरे के लिए प्यार। छुप छुप कर एक दूसरे को छज्जे से देखना , कागज़ पर उकेरी मोहब्बत को चुपके से एक दूसरे के हाथ में थमाना , माँ के लिए तो विशाल बिल्कुल अपने खुद के बेटे जैसे था। मुझे कॉलेज छोड़ने से लेकर ,शाम की ट्यूशन तक ले जाने की ज़िम्मेदारी सिद्धार्थ को ही तो सौंप रखी थी।

पर सपने में भी नहीं सोच सकती थी हमारा ये प्यार का रिश्ता उन्हें कभी मंजूर नहीं होगा , आज भी कभी कभी माँ के वो शब्द कानों में गूंजते हैं ” ना जाने किसका खून है , क्या जात है ; ऐसे कैसे बेटी दे दे अपनी । मैंने बस एक बार माँ को पूछा था ” माँ आप तो विशाल को बचपन से पसंद करती थी ये जानते हुए भी अंकल आंटी ने उसे गोद लिया है ,फिर अब ये सब क्या है ? डांटकर मुझे तो चुप करा दिया।,पर मुझे आपसे नफरत हो गयी थी ,की आप घर के या बाजार के काम करने के लिए विशाल को बेटा बना सकती हैं , घंटों धूप में तपता था वो हमारा बिजली का बिल भरने के लिए और जब सच में अपनाने की बारी आई तो मुँह फेर लिया! कितनी कोशिश की समझाने की पर कोई सुनने को तैयार कहाँ था। मैं भी तो छोटी ही थी माँ पापा से अपनी शादी की बात करना कितना कठिन लगता था , कितना अजीब था वो सब। हमारा मिलना जुलना भी सब बंद हो गया था ,पापा जाते थे कॉलेज और ट्यूशन के लिए साथ।

और फिर तुम शहर छोड़कर चले गए और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा , न कोई फ़ोन नंबर ,न कोई पता। आंटी अंकल कुछ सालों बाद आये भी थे घर बेचने के सिलसिले में ,पर तुम नहीं आये। और अब यूँ इतने सालों बाद मेरी बेटी का रिश्ता तुम्हारे यहाँ , कितना अजीब है न ये सब ,कुछ कह भी नहीं सकती , क्या कहूं राघव से।  कैसे सामना करुँगी मैं तुम्हारा।  सोचते सोचते मैं सो गयी।

शाम को आँख खुली तो पांच बजे थे , साढ़े पांच का टाइम दिया था रणविजय भाईसाहब ने ; वे लोग आते ही होंगे। दरवाजे पर दस्तक हुई और मानों मेरी सांस रुक गयी हो , गला सूख रहा था मेरा। राघव के दरवाज़ा खोलने की आवाज़ आयी और २ मिनट बाद उन्होंने मुझे पुकारा। मेरे पैर जैसे ज़मीन से जुड़ हो गए हो ,कोशिश कर रही थी चलने की मगर नाकायाब। सिया ने पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा ; माँ , माँ …पापा कबसे आवाज़ दे रहे हैं ,क्या हुआ , आपको बुला रहे हैं। मैं अपनी उँगलियों को मरोड़ते हुए , अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कमरे से बाहर निकली , राघव वही खड़े थे ” अरे कहाँ रह गयीं थी ,ये मिलो ये हैं मिस्टर शर्मा।  मैंने हिम्मत जुटा कर नज़र ऊपर उठाकर हाथ जोड़कर नमस्ते किया !

विशाल से बरसों बाद नज़रे मिली तो लगा जैसे थकी हुई आँखों पर किसी ने गरम कपडा रख दिया। जवाब में उन्होंने मुझे हाथ जोड़कर नमस्ते किया। मैं पढ़ सकती थी उनकी आँखों को आज भी ; बैचैन सी , हज़ारों सवाल से बोझिल, झाइयों से ढकी । आकाश और सिया आपस में बात कर रहे थे ,मैंने चाय परोसना शुरू किया ,शक्कर के लिए मैंने विशाल की तरफ देखा ,२ चम्मच ; जवाब मिला ! तुम ज़रा भी नहीं बदले आज भी इतना मीठा खाते हो ,उम्र की तो ज़रा परवाह करो। मन ही मन मैं बुदबुदायी।

चाय लेकर आकाश और सिया बाहर बालकनी में निकल गए ,हम तीनों रह गए ! चुप्पी को विराम देते हुए विशाल ने बोलना शुरू किया ” मुझे लगता है राघव जी की किसी भी रिश्ते की शुरआत झूठ से नहीं होनी चाहिए ,इसलिए आपको कुछ बताना चाहता हूँ।  विशाल के ये शब्द मेरे पैरों तले की ज़मीन हटा गए थे।  क्या ज़रूरत है , क्या बताना चाहते हो , क्या होगा सच बताने से , कुछ मत बोलो विशाल। अशोक क्या सोचेंगे मेरे बारे …सिया ने सुन लिया तो क्या होगा।  इन्ही अंतर्द्व्न्द से झूझती मैं , अपने हाथो को मरोड़ रही थी ,अपने माथे के पसीने को छुपाने की कोशिश रही थी।

आकाश मेरा अपना खून नहीं है राघव साहब ! जब वो १ महीने का था तब दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड में उसे कोई मेरी चौखट पर छोड़ गया था। आस पास पता करने की बहुत कोशिश की , कि कुछ तो पता चले उसके परिवार के बारे में।  पुलिस में रिपोर्ट भी की , उन्होंने उसे अनाथालय भेज दिया। मैंने वहां जाकर उसे गोद ले लिया। मैं भी अकेला ही था , कहते हुए विशाल ने मेरी ओर देखा ! मैंने नज़रे झुका लीं, मेरी आँखे बस छलकने को तैयार थी। वो माँ बाउजी भी दुनिया छोड़ गए थे तो सोचा इस नन्ही जान को ही  अपना साथी बना लूँ। और आज वो मेरे बेटे से भी बढ़कर है।

पर मिस्टर शर्मा, रणविजय जी ने तो बताया था आपकी पत्नी ? राघव ने सवाल किया।हाँ उन्होंने झूठ कहा आपसे इसलिए मैं सच बता रहा हूँ , मैंने शादी नहीं की।  इतना कहना था की आकाश और सिया भी कमरे में आ गए और सवाल वही छूट गया ! चलिए अब हम चलते हैं , आप अच्छे से सोच समझ कर जवाब दीजिये , हमें सिया बिटिया पसंद है। सिया के सर पर विशाल ने हाथ रखते हुए कहा।

वे लोग चले गए ,सिया खुश दिख रही थी। पापा मुझे लड़का ठीक लगा , पढ़ा लिखा है , मैच्योर है ;और इतने लड़को से मिली हूँ आज तक इतना कम्फर्टेबले कभी नहीं लगा।  जेंटल मैन है।  कहकर  वो अपने कमरे में चली गयी। राघव के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था : गोद लिया है ,खुद का बेटा तो नहीं। ये सुनकर जैसे शून्य में थी। मैं एक टुक राघव के चेहरे को हज़ारों प्रश्न आँखों में लिए देख रही थी । वो खुद से बाते किये जा रहे थे ; खुद का खून तो नहीं है , ये सब मायने रखता है , ना जाने कौन माता पिता हो , कौन सी जात हो ! हम इतने भी मॉडर्न तो नहीं ? हैना आरती ,सही कह रहा हूँ न ?

राघव के चेहरे में आज मुझे माँ दिखाई दे रहीं थी। मैं चुप थी , मौन में थी ,सालों बाद मेरा अतीत मेरे सामने आकर मुझे धुत्कार रहा था , मुझपर हंस रहा था ।  उन्होंने फिर मुझे पूछा ” कुछ तो कहो , कहाँ खो गयी , ठीक कहा न मैंने। मैंने उनका हाथ थामा और कहा ” हाँ सही कह रहे हो कुछ नहीं बदला सब वैसा ही है। सिया के जन्म से लेकर आज तक हम उसका जन्मदिन किसी न किसी अनाथलय में मनाते रहे …पुण्य कमाने के लिए  ? तुम रोज़ ऑफिस जाते वक़्त रास्ते में अपनी गाडी से उतरकर किसी अनाथ बच्चे को १० रूपए का नोट थमाते हो , पुण्य कमाने के लिए ? अख़बार में जब भी किसी अनाथलय के बारे में पढ़ते हो , कितना दुःख जताते हो , क्यों ? क्यों करते हो ये दिखावा , जब दिल से अपना नहीं सकते किसी अनाथ को।  पुण्य कमाने के लिए अनाथ को खाना खिलाओ , दान दो ,पर जब उन्ही में से किसी एक को खुद के परिवार का हिस्सा बनाना हो ; बस जाति , खून , धर्म का वास्ता देकर दरकिनार कर दो।  वैरी गुड राघव।

उसके बाद राघव ने एक शब्द मुझे पलटकर नहीं कहा ,हम बिना बात किया ऐसे ही अलग अलग कमरे में सो गए।  सिया हर बार की तरह पूरी कोशिश कर रही थी , मेरी तकलीफ का कारण जान्ने के लिए पर शायद नहीं समझ पा रही थी। आज बहुत सुकून नींद मुझे आयी , दिल पर रखा एक बहुत बड़ा बोझ जैसे उतर गया हो।

अगले दिन सुबह उठी तो राघव को फ़ोन पर बात करते पाया ” हमे आकाश पसंद है भाईसाहब , सगाई की तारीख वगैरह पक्की कर लेते हैं। आज राघव को गले लगाकर मैं खूब रोई , उन्हें तो अंदाज़ा भी नहीं था की आज मेरे मन में उनके लिए सम्म्मान दुगना चौगुना हो चुका था। 

कहने की बात है बस की समय बदल रहा है ,कुछ बातें , धारणाएँ वही की वही हैं।  जाति , धर्म , रंग , रूप का अंतर आज भी बहुत पक्का है! एक सवाल आप सभी से ” क्या आप तैयार हैं एक सच्चा रिश्ता जोड़ने के लिए किसी अनाथ के साथ।  क्या आप अपनी बेटी या बेटे का हाथ थमा पाएंगे किसी गोद लिए बच्चे के हाथ में ?

वाणी भारद्वाज

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