जब मैं भी ऑफ़िस जाती हूं, तुम भी घर को संवार दो ना

जब मैं भी ऑफ़िस जाती हूं, तुम भी घर को संवार दो ना

समाज में महिलाओं की बराबरी की बातें तो बहुत बड़ी बड़ी होती हैं , पर क्या सच में महिलायें स्वतंत्र हैं ? अपने विचारों को , अपने लिए गए निर्णय को आज भी सही गलत की कसौटी पर खड़ा पाती हैं। घर से जुड़े फैसले हों , मनपसंद जीवनसाथी का चुनाव , आर्थिक फैसले हो क्या महिलायें बाकि परिवार और समाज के सदस्यों का समर्थन पा पातीं हैं ? हाँ शायद समय थोड़ा बदल गया , जब से महिलाओं ने आत्मनिर्भर खासकर की आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए प्रयास शुरू किये हैं।

मगर क्या एक कामकाजी महिला को घर के बाकी कामों में परिवार के अन्य सदस्यों का सहयोग मिलता है ? क्या जब वह सुबह उठकर रसोई के काम निपटाती है , तो स्कूल के लिए बच्चों को तैयार करने की ज़िम्मेदारी पुरुष नहीं उठा सकता ? क्या जब वो शाम को थकी हारी घर लौटती है , तो किसी रोज़ उसके हाथ में भी गरमा गर्म चाय कप का कप थमाया जाए , ऐसा नहीं हो सकता।

ऐसे ही कुछ सवालों का ताना बाना बन कर बॉलीवुड अभिनेत्री “दिव्या दत्ता” ने एक खूबसूरत और विचार करने योग्य कविता लिखी है , जिसमे एक महिला के मन की व्यथा को शब्दों में बहुत नायाब तरीके से उकेरे गया है। तो आइये पढ़ते है और वीडियो देखते है इस बेहतरीन कविता की –

तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना
नैपी जब मैं बदलती हूं तो दूध की बोतल भर दो ना
बस यूं ही एक हैं एक हैं करके कहां ज़िंदगी चलती है
कभी तुम भी सर दबा दो मेरा ये भी कमियां खलती हैं
जब मैं भी ऑफ़िस जाती हूं तुम भी घर को संवार दो ना
तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना

मत करो वादे जन्मों के इस पल ख़ुशी की वजह दो ना
कभी बाज़ारों से ध्यान हटे तो मकान को घर भी कर दो ना
आओ पास बैठो कुछ बातें करें कभी दिल के ज़ख़्म भी भर दो ना
क्यूं कहना भी पड़ता है ये तुम एहसासों को समझो ना
तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना

तुम क्रिकेट भी अपनी देखो और मैं सीरियल अपना लगाऊंगी
थोड़ा हाथ बंटा देना मैं जब किचन में जाऊंगी
सब मिलकर साथ करने की हम में ये भी तो क्वालिटी है
हम साथ खड़े हैं एक दूजे के हल ही जेंडर इक्वालिटी है
तुम भी नए से हो जाओ अब और नयी सी मुझे उमर दो ना
तुमने कहा था हम एक ही हैं बस यूं ही जीवन बसर हो ना

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