एक प्रेम ऐसा भी

एक प्रेम ऐसा भी
प्यार  प्रेम दोस्ती मित्रता ।क्या सच में प्रेम आत्मिक भी होता है ।क्या सच में सात्विकता होती है प्रेम में।क्या किसी के बचपन का अल्हड़ सा प्यार ताउम्र प्रेम बनकर ठहर सकता है बिना बदले की भावना के ।बिना ये सोंचे कि उसे तो कभी मेरी परवाह रही ही नही।क्या सच में एक पति पत्नी भी किसी से प्रेम कर सकता है ।क्या प्रेम केवल पति- पत्नी ,और निकट संबंधों मे ही हो सकता है।क्या प्रेम दो प्राणियों मे नही हो सकता।प्रेम विस्वास है प्रेम देन लेन से परे है ।सच्चा प्रेम ईश्वर है और शक्ति है।ऐसी ही ये कहानी है समर के प्रेम की,,,,,पढ़िये आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। 
स्वाति की आँखे बंद हो रही थीं,,,साँस जैसे थम सी रही थी और वह विचर रही थी किसी और लोक में।आईसीयू से अब वेंटीलेटर पर थी।बस आँखो में बचपना ,माँ का अंगना,स्कूल की सहेलियाँ ,वह,,,,,,,वह श्याम वर्ण  चेहरा और ,,,,और वह श्वेत वर्ण जिसको वह चुपके से निहारती थी ,,,,पलटा हुआ मुस्कुराता सा ,,,और फिर अपना पति ,,परिवार और बच्चे !साँस कैसे आ जा रही है ,,,नही पता उसे तो सुनाई दे रही बस एक ही धुन जैसे वो श्याम वर्ण बार बार जप रहा हो-ऊँ त्रयम्बकं यजामेह सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनात् मृत्यो मूर्क्षीय मामृतात्।
अब भी उसकी आँखे बंद थीं वह वेंटीलेटर से आई सीयू में भर्ती थी।डाक्टर ने कहा दस घंटों में होश आ गया तो वह खतरे से बाहर है।
अब उसने पलके झपकाईं तो सामने पूरा परिवार खड़ा था।माँ बाबूजी  शशाँक और उसके दोनो बच्चे उसकी अपने मम्मी पापा।माँ के हाँथों मे माला थी शायद पूरी रात जाप किया उन्होने अपनी बहू के लिए। अब वह खतरे से बाहर थी ।
हफ्ते भर बाद जब हॉस्पीटल  से घर आई तो यूँ ही मोबाइल देख रही थी कि उसकी बेटी ने बताया -माँ किसी समर अंकल का फोन आया था,,,कह रहे थे कि इसी शहर से निकल रहे थे तो सोचा हम  सबसे मिल लेते ,,,वह अपनी फैमिली के साथ थे ,,,,पर उसी दिन तो आपका पैर फिसला था और वह भयानक हादसा।
क्या ,,,,समर का फोन  ! समर आहूजा,,,? हाँ माँ शायद यही नाम बताया था।स्वाति अवाक थी,,,हैरान थी। हाँ यही चेहरा तो था जो उस रात हवन कर रहा था,,,,,,हाँ वही आवाज़  ! समर  उसका कॉलेज का फ्रैंड ।जो हमेशा निगाह चुराकर उसे देखता था और वह जानबूझ कर उसे नजरअंदाज करती थी  क्योंकि दोस्ती से ज्यादा उसके मन में कोई फीलिंग ही नही थी,,,,उसके मन में तो कोई और था,,,,वही श्वेत वर्ण  जो हमेशा उसे इग्नोर करता था और उस रात भी तो उसका चेहरा पलटा हुआ ही था।
 बीस साल हो गये उसकी शादी को।न उसने कभी  पिछली जिंदगी को देखा न ही कभी समर और समीर ने उसे याद किया। बचपना था वह जो शायद हर जिंदगी का हिस्सा है फिररररर ,,,,उस दिन जब वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी तब समर का अचानक फोन आना,,,उसको वह धुन सुनाई देना।आखिर क्या था यह सब।नही नही,,,,सब मेरी सोंच है,,आ गया होगा फोन उसका,,,निकल रहा होगा बाइचाँस इधर से स्वाति ने अपने विचारों को झटका।
शाम को फिर रिंग आई,,,,,हैलो स्वाति ।कैसी हो अब।समर   !! हाँ समर,,समर आहूजा।पहचाना या नही उसकी आवाज में वही सादगी थी।मैं अच्छी हूँ  समर,,,,,पर तुम्हे,,,तुम्हे कैसे पता लगा,,, क्या सचमुच तुम उस दिन मेरे शहर से निकल रहे थे ??? स्वाति ने एक ही साँस में प्रश्न कर डाले।नही स्वाति,,,,,कुछ अजीब सा एहसास हुआ था उस दिन।
तुम्हे तो पता ही होगा शायद कि एक ही निगाह में भायीं थी तुम,,,पर तुम्हे मैं कभी उस रूप में पसंद नही था।जानता हूँ मैं ।जिंदगी रुकती नही आगे बढ़ती है हमेशा ।तुम शशाँक जी की जीवन संगिनी बनी और मेहर मेरी जीवन साथी। जितनी तुम खुश हो अपने जीवन में मैं भी खुश हूँ  पर,,,पर  सच्चा प्रेम स्थिर रहता है । बिना किसी बदले की भावना के।मुझे तुमसे प्रेम था  है और शायद हमेशा रहेगा,,,,एक जगह दिल में जो आत्मिक है ।बस वही एहसास था,,,बहुत याद आ रही थी उस दिन तुम्हारी लग रहा था कहीं बहुत दूर जा रही हो तुम।तभी कॉल किया तुम्हारे नम्बर पर और तुम्हारे एक्सीडेंट के बारे में पता लगा।ईश्वरीय शक्ति पर हमेशा से अटूट  विस्वास है ,,,तो बस अन्न जल छोड़कर हवन रक्खा था अपनी दोस्त के लिए। अब तो सही हो न तुम।
हम्मम,,,,,हाँ समर। थैंक्यू,,,,,रूँधे गले से स्वाति बस इतना ही कह पाई ।फोन कट गया था,,,,,  दूर  कहीं  धुन बज रही थी,,,,,जिस्मों के पीछे भागे हो फिरते उतरो कभी रूह में। 
सारिका रस्तोगी
अम्बाला कैंट

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