एक बेटी जब ब्याह दी जाती है

एक बेटी जब ब्याह दी जाती है


"एक बेटी जब ब्याह दी जाती है"
दर्द को लफ़्ज़ों में नहीं ढ़ालती वो अश्कों की सहेली बन जाती है, सिंदूर की झिलमिलाहट में तन-मन की तिलमिलाहट को बखूबी मल देती है।

ब्याहता बनते ही सरताज की सारी खूबियाँ और कमियां समेटते अपने लबों की फ़रेबी मुस्कुराहट में हौले से पिरो लेती है।

छली जाती है सात फ़ेरो के सनातनी सफ़र पर चलते, कोई-कोई अबला कहाँ रिवाजों के पीछे छिपी दगाबाज़ी को पहचान पाती है।

पीहर की ना रहती है ना ससुराल की हल्की सी भूल पर नकार दी जाती है, हर मोड़ पर मोहताज सी स्त्री खड़ी खुद को ढूँढती रहती है।

ससुराल से लेनदेन रहा होगा कोई पिछले जनम का जो धकेली जाती है, मरने के बाद कफ़न भी पीहर का पहनते पूरी उम्र ससुराल पर वार जाती है।

वजूद की तलाश में भटकती है आज भी कुछ रिक्ताएं खोखली रिवायतों के आगे हारती, विमर्श की कहानियों का मुख्य किरदार बड़ी शान से निभा लेती है।

जीतना जाने कब सीखेगी मुखर होते वंदनीय सी पूजी जाती है महज़ पन्नों पर, हकिकत की धरा पर कहीं ना कहीं आज भी कोई ना कोई स्त्री रौंदी जाती है।

नाम तरंगिणी सूखी है सहरा सी नारी हर नाजुक सी सहती सब पर्वत सी, पितृसत्तात्मक की सोच की क्षितिज पर कुछ ना समझ हर युग में ठहर जाती है।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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