एक रात को बर्दाश्त कर लो

एक रात को बर्दाश्त कर लो



माना कि आज काली अंधियारी रात है, हैं दूर-दूर सब ना आ रहा कोई पास है, एक महामारी ने बन कर शहंशाह जमाया अपना सिक्का है, मगर सदा के लिए यहां कब कौन टिका है, एक दिन तो सबका है अन्त आना, उस समय ना चलेगी कोई पेश किसी की, ना चलेगा कोई बहाना ।
हम अगर सब मिलकर एक-एक दीप जलाएंगे, तमस को कैसे भला अपने नज़दीक पाएंगे, जो होगा तेल हमारे लिए में पूरा, रात के अंधियारे में भी चमक उठेगा दिन का सूरज पूरा। एक-एक बूंद पानी से ग़र सागर बन सकता है, तो एक-एक कदम चलने से राह भी कट सकता है।
रहेंगे चार दिन अपनों से बना कर दूरी, फिर ना झेलनी होगी मिलने की मजबूरी, बार-बार हाथों को अगर धुलवाएंगे, साफ-स्वच्छ तन हम ही तो पाएंगे, लगाएंगे ग़र मास्क और सार्वजनिक स्थानों पर कम जाएंगे, बिमारी को फिर हम कोसों दूर भगाएंगे, बस अंधेरे भरी इस एक रात को कर लो बर्दाश्त, फिर आने वाली नई खुशियों की सुबह हम सब मुस्कुराएंगे।

प्रेम बजाज

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