एक सफ़र कुछ ठंडा कुछ गीला: वैष्णो देवी के दर्शन

एक सफ़र कुछ ठंडा कुछ गीला: वैष्णो देवी के दर्शन

जिंदगी में सफ़र बहुत किए और यादगार भी रहे पर अगर बात सर्दियों की किसी यादगार ट्रिप की हो तो मेरे जहन में वैष्णो देवी का एक सफ़र आता है।


हमारे ऑफिस से हर साल सर्दियों में माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाते हैं । बात 2014 की है जाने की तैयारी हो रही थी। यात्रा पर जाने वालों को सारी डिटेल दे दी गई उसमें पहले ही बता दिया गया था कि वहाँ पर बारिश और बर्फबारी की संभावना है तो सभी लोग पूरी तैयारी से जाएं। जिसमें रेनकोट और छतरी के लिए कहा गया था। पर तब भी कुछ लोग इन सब बातों को नजर अंदाज करते हुए चल दिए।

मेरी मम्मी की हमेशा से आदत है कि कभी भी सफ़र पर जाओ तो पूरी तैयारी से और वही आदत मुझ में भी है।

मैंने भी अपनी पैकिंग करी सारा जरूरत का सामान रखा है एक दो विंडचीटर एक्स्ट्रा रखे जिससे कुछ लोगों ने टोका भी कि मैडम इतना सामान क्यों सब बाहर मिल जाता है।


खैर हम वैष्णो देवी पहुंचे और होटल में फ्रेश होकर नाश्ता कर के नौ बजे तक सब यात्रा के लिए निकल पड़े तब मौसम खुला हुआ था । हम दो ढाई सौ लोग थे जो अपने अपने ग्रुप में हो गए।


कुछ ही कदम चलने पर बहुत ही तेज बारिश और ओले पड़ने शुरु हो गए और तब वही हुआ जो लोग खाली हाथ हिलाते हुए आए थे वह पिन्नी से बनी जैकेट खरीद रहे थे जो बस नाम की थी। मैं जो एक्सट्रा विंडचीटर ले गई थी वो अपनी दोस्त को दी ।


जब बारिश रुकी तो सब आगे बढ़े तो हर तरफ बहुत बुरा हाल था चारों तरफ सफेद चादर बिछ चुकी थी नीचे ओलों की ऊपर बर्फ की। रास्ते में एक मार्केटिंग मैनेजर मिले बहुत परेशान से उनका बेटा छोटा था और ठंड के कारण रोए जा रहा था। उसकी इस हालत को देखकर वो लोग बीच सफर से वापस जाना चाह रहे थे तभी मुझे याद आया कि मेरी जैकेट पिट्टू बैग में रखी है मैंने उनको वो निकाल कर दी जिस मे बच्चा पूरा पैक हो गया क्योंकि वो उससे बड़ी थी और उसके बाद पूरा सफ़र आराम से किया । पर यह हाल कई लोगों का था इसलिए बहुत से लोग बीच से ही वापस चले गए क्योंकि दरबार पर तो बर्फबारी बहुत हुई थी और वहां और मुश्किल आती।


फिर समस्या हुई खाने की रास्ते की दुकानें बंद हो चुकी थी जो खुली थी उन्होंने रेट बढ़ा दिए दरबार से पहले कुछ नहीं था । मैं अपने साथ चिवड़ा ले गई थी जिससे हम सब को बहुत सहारा मिला।हमनें रात आठ बजे माता के दर्शन किए और वापस होटल आ गए ।

अगले दिन होटल में वो मैनेजर सब से कह रहे थे कि अगर स्मिता नहीं होती तो हम दर्शन नहीं कर पाते।तब सब मेरी तारीफ कर रहे थे और मैं अपनी मम्मी को कि उन्होंने यह आदत डाली कि सफ़र में जरूरत का सामान जरूर रखो सब मिलता है यह सोच कर कभी मत निकलो और खासकर पहाड़ी क्षेत्रों पर।मौलिक 


स्मिता चौहान

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