गानों के बेताज बादशाह मोह्हमद रफ़ी!

गानों के बेताज बादशाह मोह्हमद रफ़ी!

"गुलाबी आंखे जो तेरी देखी,तेरी प्यारी-प्यारी सूरत" और "ये रेशमी जुल्फें",जैसे सदाबहार गानों को अपनी आवाज देने वाले हिंदी सिनेमाजगत के महान फनकार मोहम्मद रफी का आज जन्मदिन है. इस खास मौके पर दुनियाभर के लोग मोहम्मद रफी के गए गानों को याद करते है,24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह में जन्में मोहम्मद रफी ने बॉलीवुड में तीन दशको तक अपनी आवाज का जादू बिखेरा है. मोहम्मद रफी ने कव्वाली, सूफी, रोमांटिक और दर्दभरे 26000 गाने गाए हैं. हम आपके लिए मोहम्मद रफ़ी जी के बारे में कुछ स्पेशल बातें.....


•रफ़ी के बड़े भाई उनके लिए प्रेरणा थे, रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे. उनकी दुकान पर एक फ़कीर रोज आकर सूफ़ी गाने सुनाता था,सात साल के रफ़ी साहब को उस फ़कीर की आवाज़ इतनी भाने लगी कि वे दिन भर उस फ़कीर का पीछा कर उसके गाए गीत सुना करते थे. जब फ़कीर अपना गाना बंद कर खाना खाने या आराम करने चला जाता तो रफ़ी उसकी नकल कर गाने की कोशिश किया करते थे.वे उस फ़कीर के गाए गीत उसी की आवाज़ में गाने में इतने मशगूल हो जाते थे कि उनको पता ही नहीं चलता था कि उनके आसपास लोगों की भीड़ खड़ी हो गई है, कोई जब उनकी दुकान में बाल कटाने आता तो सात साल के मुहम्मद रफ़ी से एक गाने की फरमाईश जरुर करता.


•मोहम्मद रफी जैसे दयालु इंसान काफी कम ही होते हैं, वह कभी भी संगीतकार से ये नहीं पूछते थे कि उन्हें गीत गाने के लिए कितना पैसा मिलेगा. वह सिर्फ आकर गीत गा दिया करते थे और कभी-कभी तो 1 रुपये को लेकर भी गीत उन्होंने गाया है.


•सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर रफी साहब के बारे कहती हैं, \"सरल मन इंसान रफी साहब बहुत सुरीले थे. ये मेरी खुस्किस्मती है कि‍ मैंने उनके साथ सबसे ज्यादा गाने गाए. गाना कैसा भी हो वो ऐसे गा लेते थे कि‍ गाना ना समझने वाले भी वाह-वाह कर उठते थे .ऐसे गायक बार-बार जन्‍म नहीं लेते. मशहूर गीतकार नौशाद ने मोहम्मद रफी के निधन पर लिखा था, \"गूंजती है तेरी आवाज अमीरों महल में, झोपड़ों के गरीबों में भी है तेरे साज, यूं तो अपने मौसिकी पर साहब को फक्र होता है मगर ए मेरे साथी मौसिकी को भी आज तुझ पर है नाज\"


• यूँ तो रफ़ी साहब गाने में माहिर है लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब गाते वक्त उनके गले से खून निकल गया था. हुआ कुछ यूँ था कि नौशाद साहब ने रफी साहब को प्लेबैक के लिए चुना. रफी साहब के गले की रेंज यूं तो बहुत ऊंची है. वो जिस स्केल पर आराम से गाते हैं वहां सुर लगाने में कई गायकों को चीखना पड़ेगा. मगर फिल्म के गीत "ऐ दुनिया के रखवाले" गाते समय रफी साहब को तार सप्तक के उस बिंदु को छूना पड़ा कि उनके मुंह से खून निकल आया. इसके बाद कई दिन तक रफी साहब गा नहीं पाए थे. हालांकि कुछ साल बाद उन्होंने इस गाने को फिर से रिकॉर्ड किया और पहले से भी ऊंचे स्केल तक गाया, वो भी बिना किसी दिक्कत के.


•कुंदन लाल सहगल और नूरजहां की गायकी के फैन्स रहे रफी साहब एक बार एक गाने की रिकॉर्डिंग करके बहुत खुश थे,रफ़ी जी ने घर में सबसे कहा कि वो जिसके फैन थे उसके आज गाने का मौका मिल गया. गाना था नसीब फिल्म का ‘चल मेरे भाई’ और इसमें दूसरे सिंगर थे अमिताभ बच्चन. फिल्में कम देखने के वाले रफी ‘दीवार’ के बाद से बिग बी के बड़े फैन हो गए थे. और बच्चन साहब के साथ गाना गाकर घर पर सबको ऐसे बता रहे थे जैसे कोई नया सिंगर रफी साहब के साथ गाने के बारे में बताता.


•मोहम्मद रफी का आखिरी गीत फिल्म "आस पास" के लिए था, जो उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए अपने निधन से ठीक दो दिन पहले रिकॉर्ड किया था, गीत के बोल थे "शाम फिर क्यों उदास है दोस्त".


•रफ़ी साहब को 6फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड रफी के नाम हैं. उन्हें भारत सरकार कि तरफ से "पद्म श्री" सम्मान से भी सम्मानित किया गया था.


रफ़ी साहब जैसे गायक दोबारा जन्म तो नहीं लेंगे लेकिन उनके गाने हमेशा सबकी यादों में रहेंगे.

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0