गिन नहीं गर्व बनों

गिन नहीं गर्व बनों

"गीध नहीं गर्व बनों"

क्यूँकि सुनों उस हादसे की पीड़ा, बेबसी की दर्द भरी कहानी एक पिड़ीता की ज़ुबानी,

उफ्फ़ अब तो बस करो निर्वस्त्र बदन के प्रशंसकों आँखें और चौड़ी कर लो, मेरे निश्चेतन तन को भी आँखों से नौंच लो। पर,

इससे पहले मुझ पर जो बीती उसे तो सुन लो। आठ हाथों ने घसीटते हुए बाल खिंचते नौंचते इस अबला को पटका था ज़मीन पर..बदन से एक-एक आवरण के हटने पर मेरी शर्मिंदगी भी शर्मा रही थी आँखें मूँदे आक्रोश को पीते अत्याचार झेल रही थी..मेरे निर्वस्त्र तन को समझकर मांस का टुकड़ा चार गीध चाट रहे थे, पागलपन की कगार पर खड़े लंपटता से शरारत करते कर्मों की गठरी बाँध रहे थे..मैं गुमनामी की अंधेरी गुफाओं की खतरनाक सैर करते कतरा-कतरा कट रही थी, मेरे वक्ष पर नाखूनों की टशर उभर रही थी। उसके भूखे स्पर्श और लालसा सभर कृत्य मेरी जंधाओं को फ़ाड़ रहे थे..मेरी योनि से रक्तिम रंग बह रहा था...शैतानी तरीके से संतुष्ट होते वह राक्षस पी रहे थे मेरी पीड़ को, मेरी मजबूर साँसें रुंध रही थी, बेबसी की छूरी चल रही थी मेरी आत्मा पर। सिना छलनी और कमर के नीचे के हर अंग कट रहे थे, फट रहे थे..चार जंगली उपकरण मेरे अस्तित्व को काट-काट कर टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे, मेरे हलक में चीख भी चिल्ला रही थी..


हवस के मिटते ही वासनापूर्ण राक्षसों से जूझते थक कर निढ़ाल बेहोश होते तड़प रही थी की एक ने कहा, सबूत जला दो दूसरे ने दारु की बोतल छिड़की मेरे अशक्त शरीर पर, तीसरे ने तिली जलाई और चौथे ने सबूत का अग्निसंस्कार किया मेरी काया आग की लपटों से खेलने लगी..

आहिस्ता-आहिस्ता रोम-रोम जलकर ख़ाक़ हो गया, ज़िंदगी से फासला बढ़ता गया, दरिंदों का अट्टहास अब भी गूँज रहा है मेरी लाश के आस-पास..

अब आपकी बारी है देख लो निर्वस्त्र नारी के जले हुए देह को लाश का भी बलात्कार होता है, देख रही है मेरी रूह सबकी आँखों में सांप लौटते.. कोई नहीं चाहता एक टुकड़ा चद्दर का मेरे तन को नसीब हो, कहाँ रोज़ देखने को मिलता है निर्वस्त्र नारी तन, आप भी देख लो।

खून खौल उठा तड़पती आत्मा की वेदना सुनकर।

समझो स्याही मेरा खून है, कल्पनाओं के वेगिले तरंग से उबलते खून टपकता है कलम के ज़रिए..

मैं वही लिखती हूँ जो महसूस करती हूँ,

हर सुबह एक नया ख़याल जन्म लेता है। किसी तस्वीर को अपना विषय बनाते, कल्पनाओं के रथ पर सवार होते उम्मीदें, सपने, जीने की जद्दोजहद हर रोज़ लिखती हूँ, छपते भी है पर आज,

मुझे लिखनी है विकृत मानसिकता वाले दरिंदों के मानस पटल की गतिविधियां,

"क्या हर गीध के भीतर किसी तितली को दबोचने का उन्माद पलता होगा"

तुम सशक्त हो, मर्द हो तो क्या अधिकार मिल जाता है किसीके घर की मर्यादा को खंडित कर दो। तुम्हारी वासना का वेग, और आवेग की चरम क्या किसी मासूम की इज्जत से ज़्यादा मूल्यवान और शिद्दत वाली होती है। एक पल, महज़ एक पल का चिंतन हादसे के अंजाम को रोक सकता है। क्या एक पल ठहर कर जो कृत्य करने जा रहे हो उसके परिणाम के बारे में नहीं सोच सकते?

उछाल भरी तीव्रता क्यूँ उबल पड़ती है बेबसी को तार-तार करते। अगर अपने घर की इज्जत एक बार भी नज़र को नीचा करवाते झांक ले उस एक लम्हें को रोक कर तो शायद एक ज़िंदगी उधड़ने से बच जाए। कोई धागा ऐसा नहीं बना जो उस हादसे के बाद चीर फाड़ हुई आत्मा की तुरपाई कर सकें। कैसा वेगिला जुनून होता होगा हवस की आँधी का जो किसी अबला की ज़िस्त को उज़ाड कर तबाह करने पर अमादा हो जाता होगा।

पन्नें फट जाते है उस वेदना को झेलते, कैसे लिखे कोई? बलात्कार सिर्फ़ एक घटना नहीं, मौत होती है किसी मासूम की। मांस के टुकड़ो का सेवन चंद पलों की भूख मिटाता जरूर है, पर जिसे काटकर खाया है आपने उसकी पीड़ा महसूस की है कभी? वह लाश भीतर से खाली हो जाती है। एक चोट नखशिख दर्द दे जाती है, ताज़िंदगी उभर नहीं पाती वह ज़ख़्म नाशूर बन जाता है।

ऐसे हादसों में लोग कहते है लड़की की इज्जत लूट गई, कोई ये क्यूँ नहीं कहता कि लूटने वाले ने अपने संस्कारों की इज्जत लूटी, अपने माँ बाप की आबरू को तार-तार कर दिया। सिर्फ़ लड़की पर ही लांछन क्यूँ? जब कि करतूत कोई ओर करता है। सबसे बड़ा गुनहगार तो वह दरिंदा होता है।

क्या रात के किसी पहर नींद नहीं आने पर उस हवसखोर को शिकार का लाचार चेहरा, उसकी पीड़ा और मुझे बख़्श दो वाली गुहार लगाती आवाज़ याद नहीं आती होगी? कैसे उस पाप का बोझ सहता होगा। अपने घर की बहन बेटियों में दबोची गई तितली का चेहरा भी तो दिखता होगा, तब खुद को माफ़ कैसे करता होगा? हवसपूर्ति के खेल का शिकारी आईने में खुद को कैसे देखता होगा। माथे पर लिखी किसीके बर्बादी की मोहर हंसती होगी तब डूब मरने का एहसास तो होता होगा।

कलम धगधगता शीशा उगल रही है, शब्द संयम खो रहे है, मन में बवंडर उठ रहा है। आख़िर क्यूँ ऐसी घटनाएं हर कुछ दिन बाद होती रहती है। क्यूँ राह चलती लड़की मौका लगती है, ज़िम्मेदारी नहीं। महज़ इसलिए कि किसी और की अमानत है, अपनी नहीं। एक बार, बस एक बार उस हल्के ख़याल को झटक कर परे हटा दो और सोचो इस जगह मेरी बहन होती तो? एक बार सम्मान देकर देखो अपने आप अपनी नज़र में उपर उठ जाओगे, गीध नहीं गर्व बनों।

भावना ठाकर \"भावु\" बेंगलोर

What's Your Reaction?

like
1
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0