गर्म रोटियां - Short Stories & Blogs

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सुधीर !..अपने कमरे से शिखा ने आवाज लगाई..

दूसरे कमरे में लैपटॉप पर काम करता हुआ सुधीर तुरंत आ गया..

"कुछ चाहिए क्या ?" उसने पूछा..

"नहीं..आप नीचे चले जाओ..इशू की बस आने का समय हो गया है.." शिखा ने कहा

"अरे..2 बज गए क्या.? अच्छा हुआ, याद दिला दिया.. मुझे ध्यान ही नहीं रहा.."कहता हुआ सुधीर हड़बड़ी में नीचे चला गया...

आजकल कमर दर्द की वजह से डॉक्टर ने उसको रेस्ट करने को कहा है..

अभी सुधीर को घर से ही काम करने की सहूलियत मिली हुई है.. वरना उसके लिए बड़ी मुश्किल हो जाती..हालांकि घर के काम के लिए मेड है..पर उसे खाना खुद बनाना पसंद है..अपने हाथों से गरमा गर्म रोटियां बना कर खिलाने में उसे बड़ा सुख मिलता है..

उसे अपना बचपन याद आ गया था..

जब पापा के ना रहने पर मां को नौकरी करनी पड़ी थी.. तब वो और उसका भाई स्कूल से घर आते तो..खुद घर का ताला खोलते , खुद अपने कपड़े बदलते और सुबह का बना खाना.. खुद ही परस कर खा लेते थे.. ..तब मां की कितनी याद आती थी.. उनसे लिपटने का,स्कूल की बातें करने का, मां के हाथ की गर्म रोटियां खाने का कितना मन होता था..

उसने तभी निर्णय किया था कि बहुत जरूरी नहीं हुआ तो कभी नौकरी नहीं करेगी..और करेगी भी तो अपने परिवार को हमेशा अपने हाथों की गर्म रोटी खिलाएगी..

हुआ भी यही..शादी के बाद जब ससुराल आई तो खुशी खुशी गृहस्थी संभाल ली.. और उसने घर पर ही ,आसपास के कमजोर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया...

फिर इशू के आने एक खुशखबरी मिली तो धीरे धीरे वो सब भी छूट गया..अब इशू और परिवार के इर्द गिर्द ही उसकी दुनिया सिमट गई थी..और वो इसमें ही खुश थी..

अब इस जरा सी बीमारी में ही परेशान हो गई थी लेटे लेटे. पर अभी भी उसने अपना किचन नहीं छोड़ा था..मौका मिलते ही कुछ न कुछ बना देती थी..

दस मिनट बाद ही इशू चहकती हुई घर के अंदर थी..

आते ही उसके गले से लिपटकर बोली.. "वाह मम्मा ! आज क्या मस्त टिफिन दिया था आपने..मेरी सारी फ्रेंड्स मेरा टिफिन खा गईं.."

"अच्छा..तब तो तुम्हें बहुत भूख लग रही होगी..चलो !जल्दी से तुम्हारे कपड़े बदल दूं..और तुम्हारा हाथ मुंह धुला दूं..आज मैंने लंच में तुम्हारी पसंद के राजमा बनाए हैं.. मैं गर्मागर्म रोटी बनाती हूं .. जल्दी से खा ले "

"क्या मम्मा! पता है ना ! मुझे रोटी नहीं चावल पसंद है...." इशू ने तुनकते हुए कहा...

और हैरान सी शिखा.. कभी अपनी दुखती कमर और कभी बेटी के मायूस चेहरे को देख रही थी...

उधर से सुधीर भुनभुना रहे थे.."लो भुगतो अब !..तुमने सबकी आदत खराब कर रखी है..."

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