गर्वित हूँ, कि गृहिणी हूँ

गर्वित हूँ, कि गृहिणी हूँ

"मम्मा!!!पहले मैं कुछ दिन जॉब कर लूँगी.... तभी मेरी शादी करना....इतनी जल्दी नहीं"!!!! छवि की बातों में मनुहार था।

"ठीक है बेटा!!! तेरी ये ख्वाहिश भी पूरी करूंगी....आखिर इसीलिए इतना पढ़ा लिखा भी दिया है कि वक्त पढ़ने पर,अपने पैरों पर खड़ी भी हो सके" वंदना ने प्यार से कहा...और फिर से टेस्टिमोनीयल साईट पर आंखे गड़ा दीं।


वंदना व अभय की बेटी है छवि,जिसका एमबीए पूर्ण हो चुका है। उसकी ख्वाहिश जॉब करने की है,जिससे वंदना को कोई गुरेज नहीं है।लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को ये भी समझा रखा है कि परिवार और बच्चों की समुचित देखभाल हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। वंदना उसे अपना ही उदाहरण देती हैं।


शुरू से मेधावी,हाईस्कूल में कॉलेज टॉपर, एमए - बीएड डिग्री धारक वंदना को उनकी योग्यता देख,उसी इंटर कॉलेज में सह अध्यापिका का पद मिल गया था,जिसमें वो पढ़ी थी। विवाहोपरांत भी उसका अध्यापन कार्य दो वर्षों तक जारी रहा। फिर छवि का जन्म होने पर उसे अपने ससुराल में रहना पड़ा और उसने स्वेच्छा से अपना गृहिणी पद स्वीकार किया,क्योंकि तभी वो समुचित रूप से सास ससुर,बच्चों एवं घर की देखभाल कर सकती थी। और किया भी।


तीनों बच्चों को स्वयं ही पढ़ाती, पेरेंट्स मीटिंग में जब अन्य अभिभावकों के समक्ष उसके बच्चों की तारीफ होती...तो वो गर्वित हो उठती,क्योंकि पढ़ाई के साथ साथ बच्चे अन्य गतिविधियों में भी तेज थे।


सास ससुर,साफ सुथरे कपड़ों में पूर्ण पौष्टिक एवम गर्मागर्म भोजन करते,तो वंदना को आंतरिक प्रसन्नता होती। ये सब वो अपनी संतुष्टि के लिए करती थी...किसी की तारीफ पाने के लिए नहीं।


कामवाली के ना आने पर भी उसका घर पूर्णतः व्यवस्थित,चमकता रहता।पति और बच्चों को समय से भेजती ही...साथ ही अपना भी पूरा ख्याल रखती।समय से नाश्ता,खाना सब का। आखिर जब वो स्वयं स्वस्थ और प्रसन्न रहेगी,तभी तो सबकी देखभाल कर सकेगी।


दोनों बेटियों और बेटे को उनकी रुचि के अनुसार विषय दिलवा,उच्च शिक्षा दिलवाई है....लेकिन अपनी और अपने परिवार की समुचित देखरेख कैसे करना है....ये संस्कार भी कूट कूट के भरा है..क्योंकि ये उसने अपनी माँ से सीखा है तो उस विरासत को आगे तक बढ़ाना भी है।


इन सबके साथ,उसने अपना सखियों का दायरा भी बना रखा है,जिनसे मिलकर नई डिशेस बनाना,समाज - दुनिया मे क्या चल रहा है... उससे परिचित रहना...ये भी बखूबी करती है। अपने लेखन और नृत्य के शौक को भी पूरा करती है। वो गर्वित होकर कहती है - 


"हाँ, मैं हूँ एक गर्वित गृहिणी।

जिससे रहता है,उसका परिवार ऋणी।

कर सबकी देखभाल,सबको स्वस्थ बनाऊं,

सबकी हर उपलब्धि पर,खुद भी इतराउं।

नहीं है आसान,ये ड्यूटी चौबीसों घंटे की।

फिर भी चुटकी में दूर कर देती,हर मुश्किल अपनों की।

What's Your Reaction?

like
1
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0