गर्मी की छुट्टियाँ और प्यारी सखी

गर्मी की छुट्टियाँ और प्यारी सखी

हैलो फ्रैंडस ! फ्रैंडस ,सखियाँ ,दोस्त नाम सुनते ही हमारे चेहरे पर एक अलग मुस्कान आ जाती है। जैसे इस समय आप सबके चेहरों पर खिल उठी है सुबह के सूरज सी रोशनी और खिले खिले गुलाब सी मुस्कान। इन सबके साथ अगर छुट्टियाँ भी जुड़ जायें तो फिर क्या बात है !

मैं आप सबको बताने जा रही हूँ अपनी गर्मी की छुट्टियों के बारे में। गर्मी की छुट्टियां मतलब  नानी के परिवार से मिलन और प्यारी सखी से बिछुड़न। जी हाँ मेरे लिये तो यही था।एक्चुली छुट्टियाँ होते ही अगले दिन सुबह हमारे मामा जी,,,,,हमारे घर और उसके अगले दिन करीब दो महीने के लिये  मैं अपनी नानी के घर, दिल्ली। मम्मा नही जाती थीं बस हम चार भाई बहन थे तो मम्मा को आराम मिले इस वजह से मामा जी हम दो बहनों को ले जाते थे। तब मैं पाँचवी कक्षा में थी और यह हर साल पक्का था पर मैं मन ही मन बड़े कशमकश में होती थी ।एकतरफ नानी के घर जाने की खुशी तो वहीं दूसरी तरफ  मेरे घर के सामने रहने वाली मेरी प्यारी सखी  के  साथ  पूरे दो महीने के लिये गुड्डा गुड़िया न खेल पाने का दुख।

जब थोड़ी  बड़ी हुई तो दोस्ती और भी पक्की हो गई ।स्कूल में साथ साथ ।ट्यूशन साथ ।खेलना साथ में।बस जहाँ  मुआ मई आता हमारा मुँह बनना शुरू हो जाता कि अब दो महीने  हम एक दूजे के साथ न खेल पायेंगे न बातें होंगी और उससे भी बड़ी बात जून में मेरा जन्मदिन ! जो कि हर साल बिना मेरी प्रिय सहेली के मनता था।

 थोड़ी अक्ल आई और हमारे बीच पत्रों का आदान प्रदान शुरू हुआ।हा हा हा,,,,क्या लंबे लंबे खत लिखते थे हम एक दूजे को। गिनती होती थी कि किसके पास नीले अन्तर्देशीय ,पीला पोस्टकार्ड जिसे कोई भी पढ़ सकता था या  सफेद लिफाफे( मोहर लगे ) ज्यादा हैं।जिसके पास  सबसे ज्यादा  सफेद लिफाफे हैं मतलब उसने ज्यादा याद किया । ही ,,ही,,ही,, क्या बचपना था वो।न ही आज की तरह मोबाइल और फोन थे न ही इतनी विकसित टैक्नॉलजी।  उस समय तो बस लैंडलाइन फोन थे जिनकी काॅल रेट भी दूरी के हिसाब से लगती थी।पर तब था बहुत बहुत इंतजार  और सच्ची दोस्ती व  प्यार। 
 
आज भी याद है मुझे 1990  की बात है  मैं थर्टीन इयर  की कम्पलीट होकर फोर्टीन में लग रही थी।हर साल की तरह इस बार भी मैं नानी के घर दिल्ली ही थी मेरी प्रिय सहेली और मैं दोनो  मेरे जाने से पहले खूब रोये थे जैसे मैं न जाने कहाँ जा रही हूँ ।मामा जी को देखते ही मन ही मन बहुत  गुस्सा आया ।पर कर कुछ नही सकती थी।मेरी सहेली केवल पन्द्रह बीस दिनों के लिये ही जाती थी अपनी नानी के घर इसलिये हम दोनों ही बहुत दुखी थीं।हमारी दोस्ती हमारे मुहल्ले के साथ साथ नानियों के परिवार में भी मशहूर हो गयी थी। फिलहाल उस बार मैं बड़े बेमन से छुट्टियाँ बिताने नानी के घर आई। नौ जून को बेहद उदास,,क्योंकि मम्मी भी नही आ पाईं थीं किसी वजह से और मेरी सहेली तो थी ही नही। तभी शाम साढ़ेसात बजे करीब नाना जी घर आये तो बड़ा सा लिफाफा उनके हांथ में । आते  ही बोले  देख तेरी सहेली का कार्ड आया है ।अजी कार्ड क्या ,,,,,,,,,,,किसी का दिल कहिये।बहुत सुन्दर खूब बड़ा सा कार्ड जिसमें दो लड़कियाँ बनी थीं, उसमें कुछ एक दो हमारी फोटो और रंग बिरंगे दिलों के साथ एक गुलाब का फूल जो कि मेरे पास पहुँचते पहुँचते मुरझा चुका था। अगर किसी को न पता होता कि ये लिफाफ़ा मेरी उस अलबेली सहेली का है तो कोई प्रेमपत्र ही समझता।
                     
हाय इतना बड़ा कार्ड बहुत सारे पैसे लगे होंगे उसके,,,,,और ये कार्ड हमारे शहर का तो है नही फिर कहाँ से लाई होगी ,,,,,अभी मैं ये सोंच ही रही थी कि लैटर निकला जिसमे इन सब सवालों के जबाब बकायदा थे कि  जब आगरा गयी थी तभी आर्चीज गैलरी से तेरे लिये ये कार्ड ले आयी थी और सारे बचत के पैसे तेरे कार्ड की रजिस्ट्री में लगा दिये ,,,,,और मैं ,,,,मैं बस खुशी से फूली नही समा रही थी ।खत और कार्ड साथ रखकर केक काटा और मामा जी ने मम्मा के साथ साथ सहेली से भी फोन पर बात करवाई। मेरी मनपसंद खाना बनाया था मेरी मामियों ने ,,,,,छोले बटूरे।
          
आज सोंचती हूँ तो लगता है कितने अपने थे उस समय के रिश्ते ।कितना विश्वास था अपनों में और कितना हक था रिश्तों में। मेरी सहेली से मेरा रिश्ता आज भी उतना ही करीबी और मजबूत है।ईश्वर की कृपा से हम दोनों के परिवार और पति हमारी भावनाओं को बहुत अच्छी तरह समझते हैं और हमारा रिश्ता सहजा हुआ है। नानी के घर मैं आज भी  जाती हूँ पर समयाभाव के कारण एक दो दिन के लिये अपने बच्चों की छुट्टियों में। पर उस समय का अल्हड़पन ,  छुट्टियाँ  पड़ते ही  मामा जी का हमें लेने आ जाना , सहेली को दो महीनों में चार पाँच लम्बे लम्बे पत्र लिखना और उसके जबाब का इंतजार करना ,,, सच बेहद खूबसूरत था वह सब ! आज के समय और जैनरेशन के लिये एक सपने की तरह।
मौलिक रचना
सारिका रस्तोगी

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