गौरा और स्त्रियों की स्थिति समाज में एक जैसी

गौरा और स्त्रियों की स्थिति समाज में एक जैसी

बचपन में मैं महादेवी वर्मा की किताब "गौरा" पढ़कर पशु पक्षियों के वात्सल्य रस को जानकर बहुत प्रभावित हुई थी तो वहीं दूसरी तरफ भीतर तक मन एक घृणा से भर गया था कि इंसान अपने स्वार्थ में इतना अंधा हो जाता है कि वो इंसान तो इंसान एक पशु की भी निर्मम हत्या कर सकता है। 

महादेवी वर्मा जी ने गौरा का वर्णन जिस प्रकार किया है उससे पता चलता है कि उन्हें पशु पक्षियों से बहुत लगाव था और उनके इसी लगाव ने उनको गौरा से मिलवाया था। गौरा थी तो एक गाय जिसे वो अपनी बहन के यहां से लेकर आईं थीं पर पशु प्रेमियों के लिए हर पशु उनके अपने परिवार का सदस्य ही होता है।

जिस प्रकार उनके घर में पशुओं को सम्मान और प्रेम से रखा जाता था शायद ही कोई इसे पढ़कर भाव विहवल न हो जाता हो। इतना प्रेम उनके हृदय में कि एक पशु का भी नामकरण होता था जिसमें उस गाय का नाम रखा गया 'गौरा' बकायदा गौरा के माथे पर तिलक लगा फूल माला पहना उसकी आरती तक उतारी गई थी।

महादेवी वर्मा जी ने जिस प्रकार गौरा के रूप का वर्णन किया है उससे लगता है गौरा उनके घर की बहुत दुलारी थी। गौरा भी इतना प्रेम पाकर भावविभोर हो जाती थी और अपना वात्सल्य अन्य पशुओं पर लुटाती थी। पशु भी प्रेम की बोली समझते हैं। सभी पशु पक्षी गौरा को अपनी माँ समझ कर उसके साथ खेलते थे। 

गौरा घर में सबसे हिल मिल कर बहुत समझदार भी थी जो मात्र पैरों की आहट से सबको पहचानने लगी थी। ज़रा भी उसके खाने में विलंब होता तो उसे घड़ी में अलार्म के जैसे पता चल जाता था और सबको रंभाकर अपने भोजन के बारे में बताती थी। एक छोटे शिशु की भांति वह अपने पास खड़े व्यक्ति के आगे अपनी गर्दन सहलाने के लिए बढ़ा देती फिर अपनी आँखे मूँद लेती थी|

गौरा का वात्सल्य प्रेम की छाया इतनी घनी थी कि उसके खुद के बछड़े जिसका नाम लालमणि था के साथ साथ लेखिका के घर के अन्य पशु पक्षियों के लिए भी दूध की धारा प्रवाहित हो जाती थी। वो बारह सेर दूध देती थी। दूध पि लेने के बाद वे गौरा के चारों ओर उछलते-कूदते हुए अपनी कृतग्यता का ज्ञापन करते।

इतना सुखद दृश्य पढ़ते पढ़ते मन में खुशहाली का चित्रण करते करते अचानक आंखें गीली हो गईं गौरा के जीवन का दुखान्त पढ़कर। लेखिका के यहाँ ग्वाले ने ईष्या और स्वार्थवश गौरा को सुई खिला उसकी हत्या कर दी। हाय ! विश्वास करने वाले मूक प्राणी का ऐसा जीवनान्त। पढ़कर मन भीतर तक घृणा से भर गया था। ऐसे मानव के लिए जो मानव के नाम पर इस समाज को कलंकित करते हैं और एक कलंक से कम नहीं हैं जो अपने स्वार्थ के लिए नारी तो क्या पशु पक्षियों को भी नहीं छोड़ते।

गौरा एक भोली भाली स्त्री पशु थी जो सबको एक समान प्रेम बांटती थी और समझती थी हर कोई उसको प्रेम करेगा जो की उस ग्वाले की चालाकी समझ न पाई और हम स्त्रियां भी अपना सर्वस्व लुटा कर मातृत्व स्नेह देती हैं औरों को और सबसे अपने लिए प्रेम की अपेक्षा करती हैं और ऐसे प्रेम की धोखाधड़ी में फँसकर अपना जीवानन्त कर लेती हैं। गौरा की और स्त्रियों की स्थिति समाज में काफी हद तक एक जैसी ही है। ये मेरे विचार हैं।

क्या आप सहमत हैं?? अपना विचार ज़रूर बताईएगा

मेरा लेख पढ़ने के लिए सभी पाठकों का दिल से आभार❤️

आपकी
हैप्पी {वाणी} राजपूत 

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