गृहणी की नींद !

गृहणी की नींद !

मैं एक गृहणी और मेरी नींद की परवाह पूरी दुनिया भर को रहती है। घर में रहने वाले सदस्य और बाहर से आये मेहमान अक्सर मेरा आदर सत्कार मेरी नींद से जुड़े सवालों से करते हैं। कभी कभी मैं बौराई सी एक टुक उनके चेहरे को ऐसे देखती हूँ की क्यों इन्हे मेरी आँखे पूरी खुली होने के बावजूद भी बंद दिखाई देती है। आज सुबह की ही बात करते हैं , सुबह के दस बजे थे की फ़ोन की घंटी ने मेरे सुकून की चाय वाले समय में खलल डाली। जेठानी जी का फ़ोन था , मैंने फ़ोन उठाकर हेलो बोला और पहला सवाल जो थप्पड़ की तरह मुझे आकर लगा ” अरे इतनी देर में फ़ोन उठाया, सो रहीं थी क्या ? एक पल को मैंने गहरी सांस ली और सोचा ” सुबह के दस बजे तक तो एक गृहणी आधे भ्रह्मांड के काम कर चुकी होती है ,इतना दुस्साहस की ये मुझे पूछ रहीं हैं ” मैं सो रही थी क्या !

मैंने होश संभालते हुए नहीं दीदी बस बच्चों को स्कूल ,आपके देवर जी को ऑफिस भेजकर, चाय लेकर बैठी थी। आप सुनाइए सुबह सुबह याद किया , सब खैरियत ? दूसरी तरफ से आवाज़ आयी ” हाँ सब ठीक ही , बस ऑफिस के लिए निकली हूँ ये पूछना था की एकादशी कब की है ? एकादशी….. दीदी कैलेंडर में देखकर बताती हूँ , मैंने कहा ! कैलेंडर में क्यों , ऐसे नहीं याद क्या ? नहीं , मैंने कहा ! तुम ज़िंदगी के सबसे ज़्यादा मज़े ले रही हो , न ऑफिस की फ़िक्र , ना पंचांग की सुध ,मस्त चाय की चुस्कियां ले रही हो ! इसके बाद की उनकी हंसी ,कानों को कुछ यूँ चुभ रही थी जैसे कान में कोई चींटी चली गयी हो।

उनसे बात करके मेरी चाय खट्टी हो चुकी थी , घर बिखरा देख मैंने खुद को समेंट उठी। दरवाजे की घंटी ने मेरा ध्यान फिर तोडा , प्रेस वाला था। कपड़ों की गिनती कर उसे देकर फुर्सत हुई तो हमारे पतिदेव का फ़ोन आ गया। अरे सुनती हो वो देवगढ़ वाली बुआ हैं न ,उनके बेटे का एडमिशन हुआ है यहाँ एक कॉलेज में तो वो भी बस घर पहुँचता होगा। २ बजे उसे अपने डाक्यूमेंट्स लेकर वहां जाना है तो ज़रा खाने में एक दो सब्ज़ी ज़्यादा बना लेना ! मैंने हामी भरते हुए अपना सर हिलाया। फ़ोन रखते रखते वे बोले ” आज मैनेज कर लो ,दोपहर की नींद कल ले लेना ! और उन्होंने फ़ोन रख दिया !

देखा , यहाँ भी बात का अंत मेरी नींद के चर्चों से हुआ। खैर कोई बात नहीं ,मुझे तो अब शायद आदत हो चली है ये सब सुनने की। काम निपटाते निपटाते १२ बज चुके थे ,सोचा एक सुकून की चाय अब पी ही लेती हूँ ,तो बेटे के स्कूल से फ़ोन आ गया ,मैडम आपके बेटे की तबियत ज़रा नासाज़ लगती हैं ,ज़्यादा फ़िक्र की बात नहीं ,क्या आप उसे लेने आ सकतीं हैं ? घडी की तरफ नज़र दौड़ाई तो १२:३० बजे थे , तभी दरवाज़े की घंटी भी बज गयी ! मेरा सर चकरा रहा था , फ़ोन रखकर मैंने दरवाज़ा खोला , बुआ जी का बेटा दो बड़े बैग लेकर दरवाज़े पर था। मैंने उसे चाय देकर , बेटे के स्कूल जाने की बात कही और निकल गयी।


आधा घंटे में बेटे को घर लेकर लौटी तो जेठानी जी का फ़ोन फिर से आ रहा था , मैंने गाडी की चाबी एक तरफ रखते हुए एक कान से फ़ोन लगाया। हाँ दीदी बोलिये , अरे तुम कितना देर लगाती हो फ़ोन उठाने में , सो रही थीं क्या !

ये थी मेरी (एक ग्रहणी )की नींद की व्यथा , जो चाहे २४ घंटे अपने परिवार के लिए जागती रहे , मगर पहला सवाल जो हमेशा उसे पूछा जाता है वो है ” सो रहीं थीं क्या ?

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