#होए वही जो राम रचि राखा

#होए वही जो राम रचि राखा

उत्साह था मन में बहुत ही भारी, रौनक बहुत है होने वाली

जाऊँगी अवश्य ही, बहना घर जाने की बारी

उत्सव का माहौल है, मन अन्तः तक विभोर है

जाने कितने दिन से मचा, इस माहौल का अन्दर शोर है

तैयारियों में मगन हो गई, रंगों में मशगूल हो गई

क्या दूँगी और क्या पहनूँगी, थोड़ा सा मगरूर हो गई

पर होता वही जो राम रचि राखा, बिन उनके कुछ हाथ न आता

शामिल होना या न होना, उनकी कृपा बिन मन न भाता

टिकट भी मेरी बन गई थी, पर समस्या विकट खड़ी थी

मन बहलाऊँ या सुलझाऊँ, बात कौन सी अधिक बड़ी थी

घेरों को जब तोड़ पाऊँगी, तभी तो मैं कहीं जा पाऊँगी

यह मौका तो नहीं मिलेगा, अगला तो पर ढूँढ पाऊँगी

लगी समस्या को सुलझाने, विकट जो खड़ी दूर भगाने

उसी समस्या को सुलझाकर, आज लेखनी हूँ मैं थामे

हाँ, मन में तो आ ही गया, "काश! वह लम्हा मैं जी पाती "

उत्सव का माहौल वही, जो कब से था मन का साथी

पर यह भी प्रबलता मन में है, ईश्वर करे जो सच्चा हो

उस पथ पर ही चल दो, वो ही खुद को अच्छा हो

विधान का कर्त्ता है वही, क्या होना है क्या खोना है

लम्हे तो फिर से जी लेंगे, ईश्वर के साथ ही होना है ।।



आभा कुदेशिया#जनवरीकविताएँ

#काश ! वह लम्हा मैं जी पाती

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