हर रिश्ता अनमोल है

हर रिश्ता अनमोल है

एक समय था, जब लोग  बड़े  परिवार में रहना पसंद करते थे। जिसका जितना बड़ा परिवार होता वो उतना ही संपन्न और सौभाग्यशाली माना जाता था और जिस परिवार में मेल-मिलाप होता था उसकी पूरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा रहती थी। उस दौर में मोहल्लों में ऐसा माहौल और अपनापन होता था कि 'गांव का दामाद' या 'मोहल्ले का दामाद' कहकर लोग अपने क्षेत्र के दामाद को पुकारते थे।

और अगर कोई भानजा है तो किसी परिवार का नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और गांव का भानजा माना जाता था और यही कारण था कि लोग 'गांव की बेटी' या 'गांव की बहू' कहकर ही किसी औरत को संबोधित करते थे। परिवार का नहीं, मोहल्ले का बुजुर्ग सबका बुजुर्ग माना जाता था सच  कितना अपनापन और आत्मिक स्नेह था उस दौर में। यह वह समय था, जब  समाज में रिश्तों को बोझ नहीं समझा जाता था बल्कि रिश्तों की जरूरत समझी जाती थी और ऐसा माना जाता था कि रिश्तों के बिना जीवन जीया ही नहीं जा सकता है। आज व्यक्ति अपने बीवी-बच्चों के लिए जीता है। 


उसे अपने बच्चों और अपनी बीवी के अलावा किसी और का सुख और दुख नजर नहीं आता है। वह अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इसी उधेड़बुन में लगा देता है। कि कैसे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दे और कैसे अपने आपको समाज में प्रतिष्ठित बनाए 
आपाधापी के इस दौर में जीवन से संघर्ष करता हुआ व्यक्ति आज रिश्तों को भूल गया है। आज के बच्चों को अपने चाचा, मामा, मौसी, ताया के लड़के-लड़की अपने भाई-बहन नहीं लगते। उन्हें इन रिश्तों की मिठास और प्यार का अहसास ही नहीं हो पाता है, क्योंकि कभी उन्होंने इन रिश्तों की गर्माहट को महसूस ही नहीं किया है। 

आज जहां एक ओर दुनिया सिमट रही है, वहीं दूसरी ओर रिश्ते और परिवार टूट रहे हैं।  एक-दूसरे के प्रति हमारी संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. हमारी व्यस्तताएं, हमारे अवसादों की छाया हमारे रिश्तों पर दिखने लगी है. नतीज़तन रिश्ते अपना अर्थ , अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं.  हम यह भूल जाते हैं कि स्वस्थ रिश्तो को  एक परिपक्व समाज की दरक़ार हैं।  सबसे ज़रूरी यह है कि हम यह जानें कि हमारे रिश्ते किन बीमारियों से जूझ रहे हैं यानी वे कौन-सी भावनात्मक बीमारियां हैं, जो रिश्तों को खोखला कर रही हैं। 

साथ ही रिश्तों से जुड़े उन पहलुओं के बारे में भी जानें, जो रिश्तों की इन बीमारियों को दूर करने में टॉनिक का काम करती हैं। आप किसी रिश्ते से बंधे हैं, तो आपको चाहिए कि उसे पूरे दिल से स्वीकार करें।  यदि आपको किसी पर अविश्‍वास है, तो इसका मतलब है कि आपके रिश्ते में खटास है और उस रिश्ते को आपने पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है।

अविश्‍वास किसी भी रिश्ते के लिए घातक है।  फिर चाहे बात मां-बेटी की होे, सास-बहू की या फिर ननद-भाभी की। किसी से द्वेष या जलन की भावना जहां एक ओर आपको आपके प्रियजनों से दूर करती है. वहीं दूसरी ओर आपके व्यक्तित्व को भी ख़राब करती है।  किसी से द्वेष या जलन की भावना बीमारी होने से ज़्यादा बुरी है।  यह आदत आपके किसी एक रिश्ते को नहीं, बल्कि सारे रिश्तों को बीमार कर सकती है।

हमेशा याद रखें कि आत्मसम्मान और ईगो दो अलग-अलग चीज़ें हैं, इसलिए रिश्ते निभाने में किसी भी ज़िम्मेदारी को ईगो या झूठी प्रतिष्ठा से न जोड़ें, जैसे- “हमेशा मैं ही क्यों फ़ोन करूं, वह क्यों नहीं फ़ोन करता या करती.” “हमेशा मैं ही क्यों माफ़ी मांगू.” आदि। 
एक-दूसरे की भावनाओं और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करें।  हर आज हर किसी को ख़ुद के लिए कुछ स्पेस की ज़रूरत है और इसमें कुछ ग़लत नहीं है। आप अपने रिश्ते को जितनी स्पेस देंगे, उतनी ही उनमें घुटन कम होगी। 

इन सबसे ़ज़्यादा ज़रूरी है कि आप में किसी रिश्ते को निभाने की दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए, ताकि आप उन रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाने का प्रयत्न कर सकें।  आप जिनके साथ रिश्ता बांट रहे हैं, उनका आदर, उनकी भावनाओं का आदर, उनके व्यक्तित्व का आदर करें।  किसी भी रिश्ते को  टूटने न दें, क्योंकि हर रिश्ता अनमोल है। 

अनु गुप्ता 

Pink Columnist (uttar Pradesh)

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