हवा से बातें करती मेरी हीरो रेसर साइकिल

हवा से बातें करती मेरी हीरो रेसर साइकिल

एक घंटे का एक रुपया किराया

साइकिल सीखने का जुनून मुझ पर छाया 

जब मौका मिलता उठा लाती थी

पैड़ल पर पैर मार मार खुश हो जाती थी

पापा हमें चलाना सिखाया करते थे

और हम साइकिल समेत पूरा वजन

उनपर डाल दिया करते थे

थोड़ा थोड़ा बैलेंस करना आया 

पापा पीछे से साइकिल पकड़ भागते थे

हम भी बेफिक्र हो जाते थे

एक दिन जो पीछे मुड़ कर देख लिया

पापा को न साथ देख संतुलन ही खो दिया

मैं नीचे और साइकिल ऊपर

चारों तरह देखूँ घबरा कर

घुटना गया था छिल

लेकिन दर्द की कहाँ फिक्र

किसी ने देखा तो नहीं

कही कोई मुझ पर हँसा तो नहीं

फिर जल्दी से उठ कर पापा की तरफ भागी

क्यूँ छोड़ा आपने साइकिल को

बहुत गुस्सा दिखाया था

पापा ने बड़े प्यार से सर पर हाथ फिराया था

बेटा हर समय मैं साथ नहीं रह सकता

अपने में आत्मविश्वास लाओ

और स्वयं हिम्मत दिखाओ

दर्द हो रहा था लेकिन पापा की बातो

और प्यार भरे स्पर्श ने मरहम का काम किया

और अगले दिन से पापा को

दूर से देखने का निर्देश दिया 

धीरे धीरे महारत हुई हासिल

अब हवा से बातें करती मेरी साइकिल

पूरा दिन साइकिल दौड़ती थी

मोहल्ले भर के बच्चों को सिखाती थी 

अब पापा से फरमाईश रखी

रेसर साइकिल की खावाईश रखी 

मेरी मॉंग पूरी न हो

ऐसा कैसे हो पाता

पापा की लाडली थी

मुँह से निकलते ही सब कुछ आता 

हीरो ब्रांड की रेसर साइकिल खरीदी थी

हीरोइन की माफिक उसपर सवारी करती थी

लेकिन देखो ये सब माँए एक सी होती

जब देखो मुझसे सामान मंगवाती

बेटा ब्रेड तो ले आ, सुन सुन

शीला आंटी से अपना स्वेटर भी लेती आना 

जो डिज़ाइन के लिए लेकर गयी थी

साइकिल से बस पाँच मिनिट लगेंगे

और पूरे दिन में न जाने ऐसे कितने

पाँच मिनिट साइकिल नपवाती

कॉलेज में भी थी मेरी धाक 

किसी की कहाँ इतनी बिसात

जो साइकिल रेस में दे मुझे मात।


©रुचि मित्तल

#WorldBicycleDay

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